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लीक से लड़ते गजलकार हैं संजय ग्रोवर

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संजय ग्रोवर लीक से लड़ते गजलकार हैं। इनकी गजलें अल्फ़ाज और अंदाज की कसीदाकारी में न फंसकर जिंदगी की सच्चाइयों को बाहर निकालने के लिए जद्दोजहद करती दिखाई देती हैं। ये सच को झूठ से, असली को नकली से, भलमनषी को कपट से आगाह करती हैं, तो कई बार एकाकी अंतर्मन को खंगालती, धोती, सुखाती नजर आती हैं। सांप्रदायिक विभेद, जातिगत दंभ और कूरीतियों के विरुद्ध तो ये अत्यंत मारक और पैनी धार आख्तियार कर लेती हैं।

 

संजय की रचनाओं को ब्लॉग और अन्य सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर पढ़ने वाली पीढ़ी में बहुत कम लोग जानते होंगे कि दो-ढाई दशक पहले इनकी गजलों ने देश की लगभग सभी अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं में अच्छी पैठ बना रखी थी और ये हिंदी गजल के सुपरिचित नामों में शुमार रहे हैं। हालांकि लेखन को पेशेवर मायनों में वह अनवरत या झटपटवादी परिपाटी से नहीं जोड़ पाए और बीच के कई वर्षों में बहुत कम लिखा या गायब से रहे। छपने-छपाने की होड़ में पड़ना इनकी फितरत नहीं है, शायद इसीलिए हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में सुपरिचित गजलकार के रूप में जगह बनाने के करीब एक दशक बाद वर्ष 2003 में इनका पहला गजल संग्रह ‘खुदाओं’ के शहर में आदमी प्रकाशित हुआ। इसकी दर्जनों गजलें सामाजिक कसौटी पर समय की सीमा को पार कर आज भी प्रासंगिक बनी हुई हैं, जिन्हें हाल ही में संजय ने कुछ नई गजलों के साथ ई-बुक का रूप दिया है और वे ऑनलाइन उपलब्ध हैं। उसके बाद के संग्रह उन्होंने डिजिटल रूप में ही प्रकाशित किया है। ट्वीटर और फेसबुक पर वनलाइनर पोस्ट के जमाने में संजय ने भी सोशल मीडिया पर दस्तक दी है और कई बार एकाध शेर के जरिए भी अपने दिल की बात रख देते हैं।

 

एक गजल में वह कहते हैं ‘ या तो मैं सच कहता हूं या फिर चुप ही रहता हूं ’ और सही मायनों में यही उनका रचनात्मक व्यक्तित्व है। उन्होंने सामाजिक मिथकों, पाखंड और दिखावटी जीवन मूल्यों पर करारी चोट की है। वह झूठ को उसकी आखिरी परत तक छीलते नजर आते हैं।

मसलन, 

‘सच के बारे में झूठ क्या बोलूं, 

सच भी झूठों के काम आना है’

या फिर

‘सच जब आपने आप से बातें करता है

झूठा जहां कहीं भी हो वह डरता है’

 

‘मोहरा, अफवाहें फैलाकर,

बात करे क्या आंख मिलाकर

औरत को मां बहिन कहेगा,

लेकिन थोड़ा आंख दबाकर ’

 

उन्होंने अपनी गजलों में वैचारिक और चारित्रिक दोहरेपन की भी खूब खबर ली है। जहां कहीं विरोधाभास मिला उसे शेर का जरिया बना डाला। इसकी बानकी के तौर पर कुछ गजलों का एक-एक मतला हाजिर है-

‘पद सुरक्षा धन प्रतिष्ठा हर तरह गढ़ते रहे

और फिर बोले कि हम तो उम्र भर लड़ते रहे’

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‘अपनी तरह का जब भी उनको माफिया मिला

बोले उछलकर देखो कैसा काफ़िया मिला’

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‘दिखाने को उठना अकेले में गिरना

इसी को बताया है पाने की दुनिया’

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‘बिल्कुल ही एक जैसी बातें बोल रहे थे

वे रोज एक दूसरे को खोल रहे थे’

 

 

संजय ने सामाजिक रूढ़ियों, स्वार्थपरक रिस्मो-रिवाज और बनावटी मर्यादा के जाल में कसमसाते जीवन का बड़ी संजीदगी से चित्रण किया है।

 

‘ लड़के वाले नाच रहे थे, लड़की वाले गुमसुम थे

याद करो उस वारदात में अक्सर शामिल हम तुम थे’

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 ‘ नम्र लहज़ों के लिफ़ाफ़ों में जदीदे-मुल्क़

पकड़े जाते हैं हमेशा कन्यादानों ---

‘आन को ईमान पे तरजीह वाह रे वाह

वहशी को इंसान पे दरजीह वाह रे वाह’

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नाक पकड़कर घूम रहे थे सदियों से

अंदर से जो खुद पाख़ाने निकले हैं

 

 

सांप्रदायिकता, जातिवाद और इनके राजनीतिकरण को लेकर संजय बेहद सचेत और सक्रिय नजर आते हैं। वह शेर दर शेर इनकी जहरीली प्रवृत्तियों को उजागर करते रहे हैं। यह उनके लेखन और कृतित्व के केंद्रीय विषयों में रहा है।

 

‘हिंदू कि मुसलमां, मुझे कुछ याद नहीं है

है शुक्र कि मेरा कोई उस्ताद नहीं है’

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‘छोटे बच्चों को सरेआम डराया तुमने

ऐसे हिंदू औ’मुसलमान बनाया तुमने ‘

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‘काटने की, बांटने की बात छोड़ेंगे नहीं

आदमियत छोड़ देंगे जात छोड़ेंगे नहीं’

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न मद्रासी में रहता हूं न न पंजाबी में रहता हूं

यूं ताले तो बहुत हैं मैं मगर चाबी में रहता हूं

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तो क्या संजय ग्रोवर चरम यथार्थ, आक्रोश, निराशा, बेचैनी और वैचारिक अवसाद की गजलगोई करते हैं? ऐसा नहीं लगता। उनके कई शेर अंधेरे में दिए जलाते, उम्मीदों को जगाते और संघर्ष का हौसला बढ़ाते नजर आते हैं। वह कहते हैं-

‘अपनी आग बचाए रखना,

सही वक्त जब आए, रखना

खिसक रही हों जब बुनियादें,

सच्चाई के पाए रखना’

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‘र्दद को इतना जिया कि दर्द मुझसे डर गया

और फिर हंसकर के बोला यार मैं तो मर गया’ 

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ऐसा नहीं कि भीड़ में शामिल नहीं हूं मैं

लेकिन धड़कना छोड़ दूं वो दिल नहीं हूं मैं

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‘मौत से पहले मौत क्यों आए

अपनी मर्जी का कुछ किया जाए’।

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संजय ने उस दौर में गजलगोई शुरू की थी, जब दुष्यंत कुमार की नींव पर हिंदी गजलकारों की नई पीढ़ियां अपनी ईंटें जमातीं आ रही थीं। उर्दू काव्‍यभाषा के संस्‍कार को हिन्‍दी में लेकर चलने का जोखिम यह भी है कि आपको टुटपूंजिया कवि के रूप में नजरंदाज कर दिया जाए। लेकिन संजय ने अपने संकोची स्वभाव, अनौपचारिक लेखन प्रवृत्तियों और अनियमित रचनाकर्म के बावजूद हिंदी गजल में न सिर्फ अपना स्पेस हासिल किया, बल्कि पहचान भी बनाई है। वैसे तो वह गजल में भाषिक-विधान और संरचना को लेकर काफी सतर्क दिखते हैं, लेकिन विचारों के आगे वह शिल्प को तरजीह नहीं देते। कई शेर में छंद और लयबद्दता को दरकिनार करते और सीधे अपनी बात कहते नजर आते हैं।

 

प्रमोद राय


ख़ुद ही लिखता हूं, ख़ुद ही कम्पोज़ करता हूं, ख़ुद ही तस्वीरें खींचता हूं, ख़ुद ही कवर बनाता हूं, ख़ुद ही भूमिका लिखता हूं, फिर इतने सस्ते में बेच देता हूं.......


यह पागलपन नही तो और क्या है ?


न किसीसे लोकार्पण कराता हूं, न किसीसे पब्लिसिटी कराता हूं, न बदनामी की, अफ़वाहों की, विज्ञापनों की, टीवी की, फ़िल्मों की चिंता करता हूं.....


यह पागलपन नही तो और क्या है ?


फिर भी आप पढ़ते  हैं,  यह ......... नही तो और क्या है ;)


आप तो यहीं हंसने लगे, अंदर भी बहुत कुछ है-

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(पागलखाने के सभी पागलों को समर्पित)

 

पागलों से मिलने के लिए नीचे के दो लिंकों पर जाईए-

 

1.

http://paagal-khaanaa.blogspot.com/

 

2.

https://www.facebook.com/groups/PaagalBachchePaagalAchchhe/


"पूछिए….. आप कैसे समय में से १ घंटे की अवधी जीत सकते हैं?” 

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मारए ओ’कोनारे की घडी ३ बजकर ५७ मिनट पर बंद पड चुकी हैं। परंतु उसके सामने इससे भी बहुत बडी मुसीबतें खडी हैं। जब वह अपनी घडी ठीक कराने के लिए घडीसाज के पास जाती है तो अपने आपको एक अजीबोगरीब पुरस्कार की हकदार पाती हैं। उसे अपनी जिंदगी का एक घंटा दोबारा जीने का मौका मिल जाता है। अपने अतीत के साथ कोई कितनी खिलवाड कर पाएगा इस पर सख्त और कडे नियम लागू हैं। मारए को यह चेतावनी भी मिलती है कि वह ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती जिससे समय के प्रति विरोधाभास निर्माण हो। क्या मारए अपनी उस गलती को सुधार पाएगी जिसे वह जिंदगी में सबसे ज्यादा कोसती है? "एक मार्मिक कहानी, अपनी सबसे बडी गलती सुधारने का लाखों में एक मौका!"- पाठक का विष्लेषण "एक गतिमान और नाटकीय कहानी। यदि हमें अपने अतीत को बदलने का मौका मिला तो क्या हम उसे आजमाएंगे?" -पाठक का विष्लेषण "एक मार्मिक लघु कहानी जो नॉर्स (स्कैंडेनेविया प्रांत) पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं। समय एक उपहार है, और कई बार एक आखरी मौका," - डेल एमीदइ, लेखक कैसा होगा यदि आप इसे दुबारा जी सके? 

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English translation: Marae O’Conaire has much bigger problems than the fact her watch stopped at 3:57 p.m. When she brings her watch to a kindly repairman, she learns she has won a peculiar prize, a chance to re-live a single hour of her life. But Fate has strict rules about how one can go poking in the past, including the warning that she can’t do anything that would create a time-paradox. Can Marae make peace with the mistake she regrets most in this world? A story about racism, regret, and second chances set in the historic mill city of Lowell, Massachusetts.

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Keywords: Hindi language books, Hindi books, Hindi language edition, Hindi edition, Norse mythology, Norns, time travel, Fate, interracial dating, prejudice, racism, second chances, Hindi language, Hindi edition, Hindi language edition, Hindi books, Hindi language books, Hindi language novels, Hindi books, Hindi novels, Hindi romance, Hindi language romance, reincarnation, Norse mythology, Hindi language fantasy, हिन्दी भाषा की किताबें, हिंदी किताबें, हिंदी भाषा संस्करण, हिंदी संस्करण, नॉर्स पौराणिक कथाओं, Norns, समय यात्रा, भाग्य, अंतरजातीय डेटिंग, पूर्वाग्रह, नस्लवाद, दूसरी संभावना, हिंदी भाषा, हिंदी संस्करण, हिंदी भाषा संस्करण, हिंदी किताबें, हिंदी भाषा की किताबें, हिंदी भाषा उपन्यास, हिंदी किताबें, हिंदी उपन्यास, हिंदी रोमांस, हिंदी भाषा रोमांस, पुनर्जन्म, नॉर्स पौराणिक कथाओं, हिंदी भाषा कल्पना,

The Holy Quran (पवित्र कुरान) in hindi languange edition published by The Kingdom of Saudi Arabia.

 हिंदी भाषा में पवित्र कुरान (पवित्र कुरान) कुरान पवित्र शब्द का शाब्दिक अर्थ है "पाठ"; कुरान या कुरान को भी रोमनीकृत करना इस्लाम का केंद्रीय धार्मिक पाठ है, जो मुस्लिम अल्लाह से एक रहस्योद्घाटन मानते हैं SWT (भगवान) यह व्यापक रूप से शास्त्रीय अरबी साहित्य में बेहतरीन काम माना जाता है। कुरान को अध्याय (अरबी में सूर) में विभाजित किया जाता है, जो तब छंदों (आयेह) में विभाजित हैं।

मुसलमान मानते हैं कि कुरान को ईश्वर द्वारा मुहम्मद को ग़ैरबिल (जिब्रिल) के द्वारा मौखिक रूप से 22 दिसंबर, 60 9 ईसा से शुरू हुआ था, जब लगभग 23 वर्ष की अवधि में, पैगंबर मुहम्मद ने 40 वर्ष की थी, और 632 में, उनकी मौत का मुसलमानों ने कुरान को अपने भविष्यद्वक्ताओं का एक प्रमाण, पैगंबर मोहम्मद के सबसे महत्वपूर्ण चमत्कार के रूप में, और दैवीय संदेशों की परिणति के संदेश के बारे में बताया जो संदेशों के साथ शुरू हुआ पैगंबर आदम (सूरत) से पता चला और पैगंबर मुहम्मद के साथ समाप्त हो गया। कुरान के पाठ में "कुरान" शब्द लगभग 70 गुना होता है, हालांकि अलग-अलग नामों और शब्दों को भी कुरान के संदर्भ में कहा जाता है।

The Quran Holy literally meaning "the recitation"; also romanized Qur'an or Koran is the central religious text of Islam, which Muslims believe to be a revelation from Allah SWT (God) It is widely regarded as the finest work in classical Arabic literature. The Quran is divided into chapters (surah in Arabic), which are then divided into verses (ayah).

Muslims believe that the Quran was verbally revealed by God to Muhammad through the angel Gabriel (Jibril), gradually over a period of approximately 23 years, beginning on 22 December 609 CE, when Prophet Muhammad SAW was 40, and concluding in 632, the year of his death. Muslims regard the Quran as the most important miracle of Prophet Muhammad SAW, a proof of his prophethood, and the culmination of a series of divine messages that started with the messages revealed to Prophet Adam (Pbuh) and ended with Prophet Muhammad SAW. The word "Quran" occurs some 70 times in the text of the Quran, although different names and words are also said to be references to the Quran.

According to the traditional narrative, several companions of Prophet Muhammad SAW served as scribes and were responsible for writing down the revelations. Shortly after Prophet Muhammad SAW passed away, the Quran was compiled by his companions who wrote down and memorized parts of it. These codices had differences that motivated the Caliph Uthman to establish a standard version now known as Uthman's codex, which is generally considered the archetype of the Quran known today. There are, however, variant readings, with mostly minor differences in meaning.

The Quran assumes familiarity with major narratives recounted in the Biblical scriptures. It summarizes some, dwells at length on others and, in some cases, presents alternative accounts and interpretations of events. The Quran describes itself as a book of guidance for mankind 2:185. It sometimes offers detailed accounts of specific historical events, and it often emphasizes the moral significance of an event over its narrative sequence. The Holy Quran is used along with authentic and reliable hadith to interpret sharia law. During prayers, the Quran is recited only in Arabic.

Someone who has memorized the entire Quran is called a hafiz. Quranic verse (ayah) is sometimes recited with a special kind of elocution reserved for this purpose, called tajwid. During the month of Ramadan, Muslims typically complete the recitation of the whole Quran during tarawih prayers. In order to extrapolate the meaning of a particular Quranic verse, most Muslims rely on exegesis, or tafsir.

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