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स्वामी विवेकानन्द ने भारत के पुनरुत्थान तथा विश्व के उद्धार के लिए जो महान् कार्य किया, वह सभी को विदित है। वे चैतन्य एवं ओजशक्ति की सजीव मूर्ति थे। उनका दिव्य व्यक्तित्व उनकी वाणी मे प्रकट होता है। उनकी प्रतिभा सर्वतोमुखी थी। अत: उनके श्रीमुख से समय-समय पर जो सूक्तियाँ और सुभाषित प्रकट हुए हैं, वे सब अत्यन्त सारगर्भित, उद्बोधक तथा स्कूर्तिदायक हैं एवं अन्यत्र न पाये जाने वाले अनेक मौलिक विचारों से परिपूर्ण होने के नाते ये 'सूक्तियाँ एवं सुभाषित, विवेकानन्द-साहित्य में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। धर्म, संस्कृति, समाज, शिक्षा प्रभृति सभी महत्वपूर्ण विषयों से सम्बन्धित ये मौलिक विचार जीवन को एक नया दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। उच्चतम आध्यात्मिक अनुभूति पर आधारित ये विचार व्यक्तिगत जीवन और सामूहिक कार्यों में उचित परिवर्तन के निमित्त तथा जीवन के सर्वांगीण विकास के हेतु निश्चित ही विशेष हितकारी सिद्ध होगे।
 स्वामीजी ने ज्ञानयोग का विवेचन उपनिषद् तथा भगवद्रीता के आधार पर किया है और इस प्रकार इन प्रवचनों में उन्होंने यह स्पष्ट दर्शाया है कि ज्ञानयोग साधक को किस तरह मुक्ति के लक्ष्य की ओर ले जाता है। साथ ही उन्होंने यह भी बड़े सरल ढंग से बतला दिया है कि ज्ञानयोग के मार्ग में सफल होने के लिए किन गुणों तथा साधना की आवश्यकता है। इस ज्ञानयोग का अनुसरण कर आत्मज्ञान में प्रतिष्ठित हो शाश्वत सुख की प्राप्ति किस प्रकार हो सकती है, इसका दिग्दर्शन भी स्वामीजी ने बड़े सुन्दर एवं युक्तियुक्त रूप से किया है। आदर्श जीवनगठन के लिए ज्ञानयोग किस रूप से उपयुक्त है, इस सम्बन्ध में स्वामी विवेकानन्दजी के ओजपूर्ण विचार सभी का निश्चित मार्गदर्शन करेंगे।
वस्तुतः जीवन और शिक्षा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। शिक्षा जीवन-पर्यंत चलनेवाली प्रक्रिया है। आदमी जन्म से लेकर मृत्यु-शय्या तक शिक्षा ग्रहण करता रहता है। अलग-अलग विद्वानों ने शिक्षा के अलग-अलग विभाग किए हैं, किंतु प्रमुखतः शिक्षा दो तरह की हो सकती है-एक तो औपचारिक, जो कि एक पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार निर्धारित पाठ्यक्रम और निर्धारित समय-सीमा के अंतर्गत दी जाती है तथा दूसरी अनौपचारिक शिक्षा, जिसे व्यक्ति कहीं भी, किसी से भी, कभी भी ग्रहण कर सकता है। जैसे कि एक कहानी में एक पराजित राजा ने मकड़ी से शिक्षा ग्रहण की और अंततः विजयी हुआ। ये जो बड़े-बड़े ग्रंथ हैं, जिन्हें बड़े-बड़े विद्वानों ने लिखा है-ये भी अनुभवों का संकलन मात्र हैं, जिसका हस्तांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में शिक्षा के माध्यम से होता है। इन ग्रंथों का प्रयोजन यही होता है कि हमारी आनेवाली पीढ़ी को वे दुःख न सहने पड़ें, जो कि अज्ञानतावश उन्होंने सहे हैं। किंतु वर्तमान में यदि हम अपना अवलोकन करें तो हमारी मानसिकता ऐसी हो गई है जिसमें हम पुराने अनुभवों से सीख न लेकर उस विषय पर स्वयं प्रयोग करके सीखने का प्रयास करते हैं। यह अच्छी बात है, किंतु इसकी हानि भी बहुत है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि इसमें एक तो हमारा कीमती समय बरबाद होता है, साथ-ही-साथ कभी-कभी हम केवल प्रयोग के उपकरण मात्र बनकर रह जाते हैं या कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम एक प्रायोगिक शृंखला के सदस्य बन जाने के कारण प्रयोग के बाद अगले प्रयोग में फँसते जाते हैं और अपने जीवन को नष्ट कर देते हैं। इतना सबकुछ जानने के बाद भी हम स्वयं प्रयोग करने में ही ज्यादा आस्था रखते हैं।
'श्रीमद्भगवद्गीता' आनन्दचिदघन, षडैश्वर्यपूर्ण, चराचरवन्दित, परमपुरुषोत्तम साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य वाणी है। यह अनन्त रहस्यों से पूर्ण है। परम दयामय भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से ही किसी अंश में इसका रहस्य समझ में आ सकता है। जो पुरुष परम श्रद्धा और प्रेममयी विशुद्ध भक्ति से अपने हृदय को भरकर भगवद्गीता का मनन करते हैं, वे ही भगवत्कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव करके गीता के स्वरूप की किसी अंश में झाँकी कर सकते हैं। अतएव अपना कल्याण चाहनेवाले नर-नारियों को उचित है कि वे भक्तवर अर्जुन को आदर्श मानकर अपने में अर्जुन के-से दैवी गुणों का अर्जन करते हुए श्रद्धा-भक्तिपूर्वक गीता का श्रवण, मनन, अध्ययन करें एवं भगवान् के आज्ञानुसार यथायोग्य तत्परता के साथ साधन में लग जायँ। जो पुरुष इस प्रकार करते हैं, उनके अन्तःकरण में नित्य नये-नये परमानन्ददायक अनुपम और दिव्य भावों की स्फुरणाएँ होती रहती हैं तथा वे सर्वथा शुद्धान्तःकरण होकर भगवान् की अलौकिक कृपासुधा का रसास्वादन करते हुए शीघ्र ही भगवान् को प्राप्त हो जाते हैं।
बेमिसाल गुरु लाजवाब शिष्य

इस पुस्तक के ज़रिए हम एक ऐसी महान विभूती के जीवन को आपके सामने प्रस्तुत करने जा रहे हैं, जिससे आप प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं| ये हैं स्वामी विवेकानन्द| इनकी जीवनी, आपके जीवन की नींव बन सकती है| यदि आपके जीवन को ऐसी मज़बूत नींव मिलेगी तो आपका जीवन भी दमदार बन जाएगा|

स्वामी विवेकानन्द के जीवन की नींव थे उनके बेमिसाल गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस| स्वामी विवेकानन्द का जीवन गुरु भक्ति की मिसाल है| श्री रामकृष्ण परमहंस के पास आकर विवेकानन्द की सत्य की खोज पूरी हुई और वे एक ऐसे लाजवाब शिष्य बने, जिन्होंने अपने गुरु की शिक्षाओं को पूरे विश्‍व में फैलाया|

स्वामी विवेकानन्द आज के युवाओं के लिए एक प्रेरणा स्रोत हैं और आदर्श प्रस्तुत करते हैं| उनका आत्मिक बल आज की पीढ़ी के लिए मिसाल है| उनके कार्य और शिक्षाएँ आज भी युवाओं को सत्य के रास्ते पर चलना और फल की कामना किए बिना सेवा करना सिखाती हैं|
- यदि आप सत्य के खोजी हैं तो यह पुस्तक आपको शिष्य बनने की प्रेरणा देगी
- यदि आप शिष्य हैं तो यह पुस्तक आपको भक्त बनने का रास्ता दिखाएगी
- यदि आप भक्त हैं तो यह पुस्तक आपको भक्ति की अभिव्यक्ति करना सिखाएगी|

यदि आप भक्ति की अभिव्यक्ति कर रहे हैं तो निश्‍चित ही स्वामी विवेकानंद की जीवन-गाथा आपके भीतर निःस्वार्थ जीवन जीने की प्रेरणा जगाएगी… इसे अपने विकास के लिए ज़रूर पढ़ें|
एक अभिनेता के रूप में, जिसके खाते में 450 से अधिक फिल्में हैं, मुझे दुनिया की सैर करने और विविध प्रकार के कामों में लगे सैकड़ों व्यक्तियों से मिलने का अवसर मिला, जिनमें राष्ट्रपति से लेकर आम आदमी; खरबपति से लेकर दरिद्र तक शामिल थे। मेरे लिए यह बहुत मायने रखता है, क्योंकि मुझे लोगों से मिलनाजुलना पसंद है। उनका विश्लेषण करना भी मुझे बहुत रोचक काम लगता है।
असल में, मुझे लगता है कि मुझमें लोगों का विश्लेषण करने की क्षमता है। जब मैं उनसे बात करता हूँ, तो कभी-कभी सोचता हूँ कि वे कैसा जीवन जी रहे होंगे, किस प्रकार की पृष्ठभूमि से आए होंगे, उनका परिवार कैसा होगा और क्या चीज उन्हें कामयाबी दिलाती है? निश्चित रूप से एक पेशेवर अभिनेता के रूप में मेरे व्यवसाय ने मुझे इस प्रक्रिया ने स्वयं को माँजने में मदद की है, क्योंकि अपने चरित्र को समझना और उसके अंदर घुसना आपके प्रदर्शन को अधिक विश्वसनीय बनाता है?
परंतु मेरे लिए, दूसरों के विश्लेषण पर बात खत्म नहीं होती। मैंने लगातार खुद का विश्लेषण और अपने आप को नए रूप में सामने लाने का प्रयास किया है। आप 50 फिल्मों में किसी चरित्र को, जैसे पिता का चरित्र, एक ही तरीके से नहीं निभा सकते। आपको भिन्न होना होगा और अपने आप को नया रूप देना होगा। और वह प्रक्रिया तभी शुरू होती है, जब आप अपने आप को फिर से खोजते हैं।
मेरे लिए खुद को खोजने की वह प्रक्रिया तब शुरू हुई, जब कुछ वर्ष पहले मैं अपने नाटक 'कुछ भी हो सकता है' की योजना बना रहा था। यदि आप मेरी फिल्मों की संख्या देखें, तो मैं एक बहुत कामयाब अभिनेता था। मुझे मिली आलोचकों की सराहना और मेरे हिस्से में आए पुरस्कारों को देखें, तो वे मुझे एक बेहतर अभिनेता ही प्रमाणित करते हैं।
चाणक्य का नाम आज कौन नहीं जानता? भारतीय अर्थव्यवस्था, राजनैतिक व्यवस्था, शैक्षणिक व्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था को सुनियोजित बनाए रखने की एक उत्कृष्ट बौद्धिक परम्परा को जन्म दिया, जिसने अपने कूटनीतियों से शत्रुओं का दमन किया। साथ ही अपनी प्रतिभा से संस्कृत-साहित्य को अत्यंत महत्त्वपूर्ण बनाया और अपनी सम्पूर्ण जीवनशैली को दूसरों के शिक्षार्थ प्रस्तुत रखा। स्वयं सम्राट बनाया। जिसने चरित्र, स्वाभिमान और कर्तव्यनिष्ठा को प्रमुखता दी, उसी पुरुष शिरोमणि का नाम ‘चाणक्य’ है।

‘चाणक्य नीति’ अत्यंत प्रचलित है। प्रायः लोग अपनी बातों को वजनदार बनाने के लिए इस उपदेश युक्त वचनों का सहारा लेते हैं। ये नीतियां वाकई बहुत दमदार और जीवन को सुनियोजित जीने की सही राह बताती हैं। इन नीतियों के पालन से जीवन में पराजय का मुंह नहीं देखना पड़ता है।

‘चाणक्य सूत्र’ वस्तुतः सुक्तियां हैं, जिसे याद कर लेने में कोई कठिनाई नहीं होती है। ये ऐसे सूत्र हैं जो हर पल जीवन के हर मोड़ पर गुरुमंत्र का काम करते हैं। इस पुस्तक में सरल शब्दों में सटीक बातें कही गईं हैं जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण और बहुपयोगी हैं।

स्वामी विवेकानन्द के सन्देशों में भारत के आध्यात्मिक भण्डार का सारतत्त्व समाहित है जिसे उन्होंने आधुनिक परिप्रेक्ष्य में वैज्ञानिक आधार पर सहज-सरल शब्दों में हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। ये सभी विश्वमानवता के लिए प्रेरणादायी हैं. समाज के सभी वर्ग, सभी धर्म एवँ सभी जातियों के मनुष्यों के लिए समान रूप से उपयोगी है। स्वामीजी की शक्तिशाली प्रोत्साहक वाणी युवकों के मन को जगाने वाली है। आत्मविश्वास एवं जीवन की समस्याओं का सामना करने की शक्ति प्रदान करने वाली, उनके हदय में प्रेम एवं सेबाभाव उत्पत्न्न करनेयाली, हमेशा नैतिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करने वाली एवं जीवन की कठिनाइयों और अनिश्चितता के समय सही मार्गदर्शन करने वाली है। प्रस्तुत पुस्तक स्वामी के प्रसिद्ध उपदेशों एवं प्रेरणादायी उक्तियों का संग्रह है, जिसे विवेकानन्द साहित्य से लिया गया है
इंसान का मन विचार निर्माण करने की फैक्टरी है जिससे बिना रुके विचार प्रकट हो रहे रहे हैं। अनचाहे, जमा हो चुके विचारों की वजह से तनाव और दुःख का निर्माण होता है। क्या इन विचारों को नियंत्रित किया जा सकता है... कोई दिशा दी जा सकती है... या इन्हें रोका जा सकता है... क्या इन विचारों का निर्माण लाभ देनेवाले, सकारात्मक रूप से हो सकता है। इस पुस्तक में सरश्रीजी विचारों के नियमों को समझाते हैं। विचारों को कैसे नियंत्रित किया जाए तथा दिशाहीन विचारों को कैसे उपयुक्त दिशा देकर उनसे कार्य करवाया जाए।विचार नियम क्या है?क्या यह संभाव है विचार नियम के इस्तेमाल से इंसान के द्वारा कुछ भी प्राप्त किया जा सकता है?क्या यह संभव है कि दो परस्पर विरोधी विचारों के परिणाम वास्तविक जीवन में देखने को मिलते हैं?हमारे जीवन को विचार नियम कब, क्यों और कैसे प्रभावित करते हैं?मन को पुराने नकारात्मक विचारों से मुक्ति कैसे मिले?यह कैसे पता चले कि कोई घटना दिव्य योजना के अनुसार हो रही है या नहीं?हमारे अवचेतन मन की प्रोगामिंग कब और कैसे होती है तथा क्या उस प्रोग्रामिंग को बदला जा सकता है?विचारों के ध्यान के लिए कौनसी मूल बातें हैं?
 हॉकिंग का आत्मानुशासन, उनका प्रभाव, समय का कठोर पालन। हमारे यहाँ ऐसा विकलांग व्यक्ति दयनीय, दीन, निराश और हताश दिखता है। हॉकिंग मजबूत मिजाज के, दृढ़ निश्चयी और जिद्दी हैं। ये सब गुण उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व के द्योतक हैं। इसलिए वे बिना किसी ऊब के बुद्धि के बल पर नए-नए प्रश्न सुलझाते रहते हैं। इसका मूल रहस्य है-उनका जीवन से असीम प्रेम। इस प्रकार मन की पक्की धारणा है कि जिजीविषा से जीवन का लोभ कम नहीं होता। शरीर से प्रेम भी कम नहीं होता। तभी तो वे स्वयं को सदैव ठीक-ठाक रखते हैं। कैसे भी जीवन बिताना है-इस प्रकार का विचार उनके मन को छूता तक नहीं। यही कारण है कि वे हमेशा तरोताजा रहते हैं। ठीक समय पर विश्वविद्यालय जाते हैं और ठीक बारह बजे चाय पीने के लिए आते हैं। उनकी विद्वत्ता और बुद्धि इतनी है कि उनके आलोचक उन्हें नाम से नहीं पुकारते, बल्कि ‘प्रोफेसर हॉकिंग’ कहकर संबोधित करते हैं। उनके साथ बोलते समय व्यर्थ की बातें करने की आजादी किसी को नहीं। यह सही है कि विद्वत्ता के प्रति आदर के बिना कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता।
प्रस्तुत पुस्तक में उनके वैज्ञानिक शोध, व्याख्यान, उनकी महत्त्वपूर्ण मुलाकातों तथा जीवन के विभिन्न पहलुओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। आशा है, पाठकों को यह पुस्तक रोचक एवं ज्ञानवद्र्ध्रक लगेगी और प्रो- हॉकिंग से संबद्ध उनकी सभी जिज्ञासाओं को शांत करेगी।
गर लक्ष्य निर्धारित हों, दृढ़ इच्छाशक्ति हो, सोच स्पष्ट हो तो कम संख्या के लोग भी बदलाव ला सकते हैं, किसी की जिंदगी बदल सकते हैं, भविष्य को सुधार सकते हैं। अगर आप उद्यमी हैं तो आपमें यह दृष्टि होनी चाहिए कि आपका आइडिया किस तरह की शक्ल अख्तियार करेगा, कैसे नतीजे देगा? विभिन्न प्रकार की समस्याओं और अक्षमताओं वाले विशिष्ट बच्चों में भी दुनिया जीतने की क्षमता होती है। दुनिया उनके लिए भी सुखद होती है, लेकिन उनकी क्षमताओं को आगे बढ़ाना चाहिए कि उनके साथ बुरा बरताव करना चाहिए। किसी भी बीमारी से लड़ने के लिए मजबूत इच्छाशक्ति का होना सबसे ज्यादा जरूरी है। दवा तो सिर्फ शरीर को बीमारी से लड़ने में मदद करती है। मन मजूबत होगा तो आप बीमारी से सीधे टक्कर ले पाएँगे और उसे हरा पाएँगे। अगर आपका इरादा पक्का है तो आप अनजान जगहों पर भी सफल हो सकते हैं। अपने हुनर का जादू दिखा सकते हैं। अगर आप किसी घटनाक्रम से परेशान हैं। कहीं आपको दरकिनार किए जाने का एहसास हो रहा है तो विरोध करने से बेहतर है कि आप ज्ञान हासिल कीजिए, जानकारियाँ जुटाइए, फिर मोरचा खोलिए। जीत आपकी होगी।.
पंजाब.पाँच पावन नदियों के किनारे बसा भारत का सबसे समृद्ध प्रांत। वह प्रांत, जहाँ की उपजाऊ भूमि विभिन्न प्रकार के अन्नों को पैदा कर भारतवर्ष के अधिकांश निवासियों का भरण-पोषण करती है। हरी-भरी लहराती फसलों से युक्त खेत; कल-कल बहती नदियों का मीठा पानी; रंग-बिरंगे धोती-कुरते के साथ तुर्रे वाली पगड़ी की पारंपरिक वेशभूषा पहने लंबे-चौड़े बलिष्ठ युवक; चुनरी की ओट से लजातीं-शरमातीं युवतियाँ; प्रेम, संतोष, धैर्य, संयम, त्याग, स्वाभिमान एवं समृद्धि का संदेश देती हुई पंजाबी सभ्यता और संस्कृति.यद्यपि इन बातों से पंजाब का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है, परंतु पंजाब की पहचान केवल इन्हीं गिनी-चुनी वस्तुओं तक सीमित नहीं है। इसकी पहचान में उन वीरों का अगाध शौर्य भी सम्मिलित है, जो भारतीय सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के लिए हजारों वर्षों से प्रयत्नशील रहे हैं। इसकी मिट्टी से आनेवाली सोंधी-सोंधी खुशबू में उन देशभक्तों के खून की खुशबू भी मिली हुई है, जिन्होंने देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
हमारे जीवन का लक्ष्य जैसा भी हो उसे पाने के लिए पहला कदम हमें ही उठाना पड़ता है। एक हजार मील की दूरी तय करने के लिए शुरुआत पहले कदम से ही होती है। इस पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में लिखे अनमोल सफलतम नियमों का पूरा-पूरा लाभ लेने के लिए जरूरी है कि आप बहुत ही धैर्य एवं विश्वास के साथ समझते हुए पढ़ें। अभी तक जिसका लक्ष्य निर्धारित नहीं हुआ होगा तो उसका लक्ष्य तय हो जायेगा और जिसका लक्ष्य निर्धारित होगा तो उसको उसका लक्ष्य पाने का सरल उपाय मिल जायेगा। समस्या किसी भी क्षेत्र से हो उसका समाधान इस पुस्तक को पढ़ते-पढ़ते मिल ही जायेगा। नकारात्मक विचारों में ही सारी समस्याओं का कारण छिपा होता है। समाधान पाने के लिए उन कारणों को कैसे खोजा जाये। इसका तरीका इस पुस्तक में दिया गया है। बेहद सावधानी से इस पुस्तक को पढ़ने की जरूरत है। क्योंकि कब किस पेज पर आपको वह उपाय मिल जाय जिसके मिलते ही आपके मार्ग की कुछ ऐसी बाधाएं समाप्त हो जायें जिनके होने से आपका विकास न हो रहा हो और आप लम्बे समय से उसी स्थान पर रुककर अपने आपसे ही युद्ध लड़ रहे हों। ऐसे संकट के समय में यह पुस्तक आपकी जरूर मदद करने वाली है। इस पुस्तक को छोटे-छोटे अध्यायों में लिखने का उद्देश्य मात्र यह है कि आपका समय धन एवं उर्जा का न्यूनतम् निवेश हो और लाभ की प्राप्ति अधिकतम् हो। टकराव और समस्या का जन्म दूसरों को बदलने के परिणाम स्वरूप होता है। इसलिए समाधान और सफलता पाने के लिए खुद को बदलने के लिए तैयार रहें। हर दिन सफल होने के नियमों पर चलने वाले ही एक दिन महानतम् सफलताओं एवं उपलब्धियों को प्राप्त कर ही लेते हैं। एक दिन में ही अधिकतम् सफलता चाहने वाले लोगों को निश्चित ही नकारात्मक परिणामों के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि यही सृष्टि का अटल नियम है
जब प्रेम का यह उच्चतम आदर्श प्राप्त हो जाता है, तो ज्ञान फिर न जाने कहाँ चला जाता है। तब भला ज्ञान की इच्छा भी कौन करे? तब तो मुक्ति, उद्धार, निर्वाण की बातें न जाने कहाँ गायब हो जाती हैं। इस दैवी प्रेम में छके रहने से फिर भला कौन मुक्त होना चाहेगा? ''प्रभो! मुझे धन, जन, सौन्दर्य, विद्या, यहाँ तक कि मुक्ति भी नहीं चाहिए। बस इतनी ही साध है कि जन्म जन्म में तुम्हारे प्रति मेरी अहैतुकी भक्ति बनी रहे।'' भक्त कहता है, ''मैं शक्कर हो जाना नहीं चाहता, मुझे तो शक्कर खाना अच्छा लगता है।'' तब भला कौन मुक्त हो जाने की इच्छा करेगा? कौन भगवान के साथ एक हो जाने की कामना करेगा? भक्त कहता है, ''मैं जानता हूँ कि वे और मैं दोनों एक हैं, पर तो भी मैं उनसे अपने को अलग रखकर उन प्रियतम का सम्भोग करूँगा।'' प्रेम के लिए प्रेम - यही भक्त का सर्वोच्च सुख है
स्वामी विवेकानन्दजी के कुछ महत्वपूर्ण व्याख्यान तथा उनके कुछ प्रवचनों का सारांश ''आत्मतत्त्व'' के रूप में पाठकों के सम्मुख है। 'आत्मा', ' आत्मा:उसके बन्धन तथा मुक्ति', 'आत्मा, प्रकृति तथा ईश्वर', ' आत्मा का स्वरूप और लक्ष्य' आदि पुस्तक के विभिन्न, अध्यायों में स्वामीजी ने आत्मा के स्वरूप, उसके बन्धन तथा मुक्ति का विवेचन किया है। स्वामीजी? का कथन है - 'आत्मानुभूति ही वस्तुत: धर्म है।' अत: आत्मा के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर उसकी प्रत्यक्ष उपलब्धि के द्वारा अज्ञान के बन्धनों से मुक्त होना ही मानव-जीवन का चरम लक्ष्य है। आत्मस्वरूप की मीमांसा करनेवाले तीन मत - द्वैत, विशिष्टाद्वैत और अद्वैत का विश्लेषण कर स्वामीजी ने इस पुस्तक में स्पष्टत: दर्शा दिया है कि ये तीनों मत परस्पर विरोधी नहीं, अपितु परस्पर पूरक हैं। स्वामीजी ने इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला है कि आत्मानुभूति प्राप्त करने के लिए बाह्य और आन्तर प्रकृति पर विजय प्राप्त करना आवश्यक हैं तथा यह विजय- लाभ वासना-त्याग एवं अन्तःशुद्धि के बिना सम्भव नहीं। मानव-जीवन के सफल होने के लिए तथा सच्चे सुख एवं शान्ति का अधिकारी बनने के लिए आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्यतया आवश्यक है और इसीलिए इस पुस्तक में स्वामीजी ने जो मार्गदर्शन कराया है वह सभी के लिए निश्यचरूपेण श्रेयस्कर है।
प्रेमचन्द हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार हैं और उनकी अनेक रचनाओं की गणना कालजयी साहित्य के अन्तर्गत की जाती है। ‘गोदान’ तो उनका सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है ही, ‘गबन’, ‘निर्मला’, ‘रंगभूमि’, ‘सेवा सदन’ तथा अनेकों कहानियाँ हिन्दी साहित्य का अमर अंग बन गई हैं। इनके अनुवाद भी भारत की सभी प्रमुख तथा अनेक विदेशी भाषाओं में हुए हैं। इन रचनाओं में उन्होंने जो समस्याएँ उठाईं तथा स्त्री-पुरूषों के चरित्र खींचे, वे आज भी उसी प्रकार सार्थक हैं जैसे वे अपने समय थे और भविष्य में बने रहेंगे। भारतीय समाज के सभी वर्गों का चित्रण बहुत मार्मिक है विशेषकर ग्रामीण किसानों का, जिनके साथ वे एक प्रकार से आत्मसात ही हो गये थे। ‘गोदान’ प्रेमचन्द का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यास है। इसमें ग्रामीण समाज के अतिरिक्त नगरों के समाज और उनकी समस्याओं का उन्होंने बहुत मार्मिक चित्रण किया है
वर्तमान समय के संघर्षमय एवं मानसिक तनाव से पूर्ण रूप से एकाग्रता, आत्मविश्वास और श्रेष्ठ विचारों का ज्ञान प्राप्त कर मानसिक संतुलन बनाये रखने एवं सभी समस्याओं का सामना करने के लिए अद्भुत संजीवनी शक्ति प्रदान करनेवाली यह पुस्तिका ‘सफलता के सोपान’ विद्यार्थियों एवं युवाओं के समक्ष प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यन्त आनन्द का अनुभव हो रहा है। इस पुस्तिका में ‘विवेकानन्द साहित्य’ के दस खण्डों में से विद्यार्थियों एवं युवाओं के जीवन विकास में अत्यन्त उपयोगी विचारों का संकलन किया गया है। इसका संकलन प्राचार्य श्री सुनील आर. मालवणकर ने किया है, हम उन्हें हार्दिक धन्यवाद देते हैं। हमें विश्वास है कि इस पुस्तिका को पढ़कर विद्यार्थियों एवं युवाओं को स्वामी विवेकानन्द के साहित्य को अध्ययन करने की प्रेरणा मिलेगी और वे जीवन में सफलता प्राप्त करेंगे।
मनुष्य यदि जीवन के लक्ष्य अर्थात् पूर्णत्व को प्राप्त करने का इच्छुक है तो उसके लिए यह आवश्यक है कि वह अपने मन के स्वभाव को भलीभाँति परख ले। मन की शक्तियाँ सचमुच बड़ी ही आश्चर्यजनक हैं। स्वामी विवेकानन्दजी ने इस पुस्तक में इन शक्तियों की बड़ी अधिकारपूर्ण रीति से विवेचना की है तथा उन्हें प्राप्त करने के साधन भी बताए हैं। स्वामीजी स्वयं एक सिद्ध महात्मा थे; उन्हें उन साधनाओं का पूर्ण ज्ञान था जिनके सहारे एक साधक चरम उद्देश्य अर्थात् आत्मानुभूति प्राप्त कर सकता है। यह सत्य है कि ये साधनाएँ भिन्न भिन्न व्यक्तियों के स्वभाव तथा उनकी प्रकृति के अनुसार अलग अलग हो सकती हैं। और इस पुस्तक में स्वामीजी ने उन साधनाओं को व्यवहार में लाने के लिए वे उपदेश तथा सुझाव दे दिए हैं जो साधक के लिए वास्तव में बड़े उपयोगी सिद्ध होंगे।
 मानव जीवन का असली लक्ष्य है "अपना सत्य'' ढूँढ़ना जो शरीर, मन, बुद्धि के परे है। ...जो अपना होना, चेतना (Consciousness) की पहचान है, जो असली "मैं' है...जो असीम है, जो व्यक्तिगत अहंकार से परे है। वह ब्रह्माण्डीय यानी अव्यक्तिगत मैं' (Universal ''I'') है, जहॉं सभी के "एक' होने (एकात्मता और समग्रता ) का अनुभव है। असली अनुभव, जो शरीर और मन के परे का अनुभव है, उसका सिर्फ संकेत किया जा सकता है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। कहानियॉं केवल संकेत देती हैं।

वैसे तो हर महापुरुष का पूर्ण जीवन जानने और मनन करने योग्य है परंतु इस पुस्तक में कुछ महापुरुषों के जीवन से जुड़ी एक-एक घटना का समावेश किया गया है। ये घटनाएँ हमें कुछ न कुछ ऐसा सीखाकर जाएँगी, जिसकी जरूरत हमें आज है, अभी है और आपके हाथ में है।
साधक-अवस्था से ही स्वामी विवेकानन्द भगवान् बुद्ध के लोकोत्तर व्यक्तित्व के प्रति अत्यन्त आकर्षण अनुभव करते थे। इसी आकर्षण से प्रेरित हो श्रीरामकृष्णदेव के विद्यमान रहते ही वे अल्प समय के लिए बोधगया को जा आये थे तथा वहाँ पर उन्हें गम्भीर ध्यानावस्था में भगवान् बुद्ध के दिव्य आस्तत्व का जीता-जागता अनुभव आया था। स्वामीजी बौद्ध धर्मग्रन्थों का अत्यन्त श्रद्धापूर्वक अध्ययन-अनुशीलन करते थे तथा अपने गुरुभाइयों को भी इस ओर प्रोत्साहित करते थे। अपने जीवन के विभिन्न प्रसंगों में, उन्होंने बुद्धदेव के दिव्य जीवन, उपदेश, धर्म इत्यादि के विषय में अत्यन्त मूल्यवान विचार प्रकट किये हैं। उनमें से कुछ ही विचार लिपिबद्ध रूप में उपलब्ध हैं, परन्तु उन पर से भी स्वामीजी की बुद्धदेव के प्रति श्रद्धा-भक्ति की गम्भीरता की धारणा हो सकती है। साथ ही इन विचारों द्वारा बुद्धदेव के दिव्य व्यक्तित्व का सुन्दर चित्र हमारे सामने उपस्थित हो जाता है।
 ‘कर्मयोग’ स्वामी विवेकानन्दजी की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक है । इस पुस्तक में उनके जो व्याख्यान संकलित किये गये है उनका मुख्य उद्देश्य मनुष्य जीवन को गढ़ना ही है । इन व्याख्यानों को पढ़ने से हमें ज्ञात होगा कि स्वामीजी के विचार किस उच्च कोटि के तथा हमारे दैनिक जीवन के लिए कितने उपयोगी रहे हैं । आज की परिस्थिति में संसार के लिए कर्मयोग का असली रूप समझ लेना बहुत आवश्यक है और विशेषकर भारतवर्ष के लिए । हम: आशा करते हैं कि यह पुस्तक भिन्न भिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले सज्जनों के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी । आवश्यकता इतनी ही है कि इसके भावों एवं विचारों का मनन कर उन्हें कार्यरूप में परिणत किया जाय।
संसार में चिरकाल से दो प्रचण्ड-धाराओं का संघर्ष होता चला आया है। इसमें से एक की मान्यता है कि अपेक्षित साधनों की बहुलता से ही प्रसन्नता और प्रगति संभव है। इसके विपरीत दूसरी विचारधारा यह है कि मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। उसके आधार पर ही साधनों का आवश्यक उपार्जन और संयोजनों के लिए सदुपयोग बन पड़ता है। वह न हो, तो इच्छित वस्तु पर्याप्त मात्रा में रहने पर भी अभाव और असंतोष पनपता दीख पड़ता है। एक विचारधारा कहती है कि यदि मन को साध सँभाल लिया जाए, तो निर्वाह के आवश्यक साधनों में कमी कभी नहीं पड़ सकती। कदाचित् पड़े भी, तो उस अभाव के साथ संयम, सहानुभूति, संतोष जैसे सद्गुणों का समावेश कर लेने पर जो है, उतने में ही भली प्रकार काम चल सकता है। कोई अभाव नहीं अखरता। दूसरी का कहना है कि जितने अधिक साधन, उतना अधिक सुख। समर्थता और संपन्नता होने पर दूसरे दुर्बलों के उपार्जन-अधिकार को भी हड़प कर मन चाहा मौज-मजा किया जा सकता है।
नींव यानी जड़ या आधार। अगर किसी मकान की नींव कमजोर होगी तो उसे धराशाई होने में देर नहीं लगेगी। उसी प्रकार यदि इंसान के चरित्र या अंत:करण की नींव मजबूत नहीं है तो उसका पतन निश्चित ही है।

इस पुस्तक में इंसान की तुलना एक पुस्तक से की गई है। जिस प्रकार 10 प्रतिशत कवर और 90 प्रतिशत पृष्ठों से निर्मित एक पुस्तक की सार्थकता अंदर के पृष्ठों में दी गई जानकारी से प्रमाणित होती है, ठीक वैसे ही इंसान का बाह्य रूप (10%) उसके अंत:करण (90%) की सार्थकता से ही स्पष्ट होता है। इसी विषय पर केंद्रित सरश्री की पुस्तक "नींव नाइन्टी' पाठकों के सर्वांगीण विकास की दिशा में मील का पत्थर है। पुस्तक में संपूर्ण चरित्र सौगात का सूत्र निर्धारित किया गया है। इसके अतिरिक्त नींव नाइन्टी मजबूत करने के सभी पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। जिससे पाठक अपने मानसिक, बौद्धिक, शारीरिक और आध्यात्मिक परिपक्वता को नया आयाम देकर समाज तथा देश के लिए प्रेरणा की जीवंत मिसाल बन सकते हैं।

पुस्तक का मूल उद्देश्य पाठकों के अंदर छिपे सद्गुणों को विकसित कराना है, जिससे वे पृथ्वी लक्ष्य आसानी से प्राप्त कर सकें। इसी उद्देश्य को साकार करने के लिए पुस्तक में महात्मा गांधी, मदर टेरेसा, विवेकानंद और संत तुकाराम जैसे महापुरुषों और विभिन्न धर्मों की शिक्षाओं का हवाला दिया गया है। पुस्तक में हर बात इतनी बारीकी से समझाई गई है कि पाठक आसानी से इसका लाभ लेकर अपना और औरों का जीवन सार्थक कर सकते हैं। 
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