विवेकानन्द का शैक्षिक दर्शन: Vivekanand Ka Shaikshik Darshan

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वस्तुतः जीवन और शिक्षा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। शिक्षा जीवन-पर्यंत चलनेवाली प्रक्रिया है। आदमी जन्म से लेकर मृत्यु-शय्या तक शिक्षा ग्रहण करता रहता है। अलग-अलग विद्वानों ने शिक्षा के अलग-अलग विभाग किए हैं, किंतु प्रमुखतः शिक्षा दो तरह की हो सकती है-एक तो औपचारिक, जो कि एक पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार निर्धारित पाठ्यक्रम और निर्धारित समय-सीमा के अंतर्गत दी जाती है तथा दूसरी अनौपचारिक शिक्षा, जिसे व्यक्ति कहीं भी, किसी से भी, कभी भी ग्रहण कर सकता है। जैसे कि एक कहानी में एक पराजित राजा ने मकड़ी से शिक्षा ग्रहण की और अंततः विजयी हुआ। ये जो बड़े-बड़े ग्रंथ हैं, जिन्हें बड़े-बड़े विद्वानों ने लिखा है-ये भी अनुभवों का संकलन मात्र हैं, जिसका हस्तांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में शिक्षा के माध्यम से होता है। इन ग्रंथों का प्रयोजन यही होता है कि हमारी आनेवाली पीढ़ी को वे दुःख न सहने पड़ें, जो कि अज्ञानतावश उन्होंने सहे हैं। किंतु वर्तमान में यदि हम अपना अवलोकन करें तो हमारी मानसिकता ऐसी हो गई है जिसमें हम पुराने अनुभवों से सीख न लेकर उस विषय पर स्वयं प्रयोग करके सीखने का प्रयास करते हैं। यह अच्छी बात है, किंतु इसकी हानि भी बहुत है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि इसमें एक तो हमारा कीमती समय बरबाद होता है, साथ-ही-साथ कभी-कभी हम केवल प्रयोग के उपकरण मात्र बनकर रह जाते हैं या कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम एक प्रायोगिक शृंखला के सदस्य बन जाने के कारण प्रयोग के बाद अगले प्रयोग में फँसते जाते हैं और अपने जीवन को नष्ट कर देते हैं। इतना सबकुछ जानने के बाद भी हम स्वयं प्रयोग करने में ही ज्यादा आस्था रखते हैं।
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About the author

Mahesh Sharma

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Additional Information

Publisher
Prabhat Books
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Published on
Aug 30, 2014
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Pages
125
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ISBN
9789350489840
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Language
Hindi
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Genres
Education / Philosophy & Social Aspects
Foreign Language Study / Hindi
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 चाणक्य ने जीवन भर जो कहा, वह इतिहास बन गया। उनके कथन नजीर बन गए। उनके कथन जितने प्रासंगिक उनके समय में थे, आज भी हैं। एक-एक कथन कठोर अनुभवों की कसौटी पर कसा खरे सोने जैसा है। इनका अनुपालन करें और अपेक्षित सकारात्मक परिणाम देखें। विष्णुगुप्त चाणक्य अन्य बालकों से भिन्न एक असाधारण बालक थे। उनके पिता चणक एक शिक्षक थे। वे भी अपने पिता का अनुसरण करके शिक्षक बनना चाहते थे। उन्होंने तक्षशिला विश्वविद्यालय में राजनीति और अर्थशास्त्र की शिक्षा ग्रहण की। इसके पूर्व वेद, पुराण इत्यादि वैदिक साहित्य का अध्ययन उन्होंने बचपन में ही कर लिया था। उनका ‘चाणक्य नीति’ ग्रंथ वैदिक साहित्य का ही निचोड़ है।
 हॉकिंग का आत्मानुशासन, उनका प्रभाव, समय का कठोर पालन। हमारे यहाँ ऐसा विकलांग व्यक्ति दयनीय, दीन, निराश और हताश दिखता है। हॉकिंग मजबूत मिजाज के, दृढ़ निश्चयी और जिद्दी हैं। ये सब गुण उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व के द्योतक हैं। इसलिए वे बिना किसी ऊब के बुद्धि के बल पर नए-नए प्रश्न सुलझाते रहते हैं। इसका मूल रहस्य है-उनका जीवन से असीम प्रेम। इस प्रकार मन की पक्की धारणा है कि जिजीविषा से जीवन का लोभ कम नहीं होता। शरीर से प्रेम भी कम नहीं होता। तभी तो वे स्वयं को सदैव ठीक-ठाक रखते हैं। कैसे भी जीवन बिताना है-इस प्रकार का विचार उनके मन को छूता तक नहीं। यही कारण है कि वे हमेशा तरोताजा रहते हैं। ठीक समय पर विश्वविद्यालय जाते हैं और ठीक बारह बजे चाय पीने के लिए आते हैं। उनकी विद्वत्ता और बुद्धि इतनी है कि उनके आलोचक उन्हें नाम से नहीं पुकारते, बल्कि ‘प्रोफेसर हॉकिंग’ कहकर संबोधित करते हैं। उनके साथ बोलते समय व्यर्थ की बातें करने की आजादी किसी को नहीं। यह सही है कि विद्वत्ता के प्रति आदर के बिना कोई भी समाज आगे नहीं बढ़ सकता।
प्रस्तुत पुस्तक में उनके वैज्ञानिक शोध, व्याख्यान, उनकी महत्त्वपूर्ण मुलाकातों तथा जीवन के विभिन्न पहलुओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। आशा है, पाठकों को यह पुस्तक रोचक एवं ज्ञानवद्र्ध्रक लगेगी और प्रो- हॉकिंग से संबद्ध उनकी सभी जिज्ञासाओं को शांत करेगी।
पंजाब.पाँच पावन नदियों के किनारे बसा भारत का सबसे समृद्ध प्रांत। वह प्रांत, जहाँ की उपजाऊ भूमि विभिन्न प्रकार के अन्नों को पैदा कर भारतवर्ष के अधिकांश निवासियों का भरण-पोषण करती है। हरी-भरी लहराती फसलों से युक्त खेत; कल-कल बहती नदियों का मीठा पानी; रंग-बिरंगे धोती-कुरते के साथ तुर्रे वाली पगड़ी की पारंपरिक वेशभूषा पहने लंबे-चौड़े बलिष्ठ युवक; चुनरी की ओट से लजातीं-शरमातीं युवतियाँ; प्रेम, संतोष, धैर्य, संयम, त्याग, स्वाभिमान एवं समृद्धि का संदेश देती हुई पंजाबी सभ्यता और संस्कृति.यद्यपि इन बातों से पंजाब का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है, परंतु पंजाब की पहचान केवल इन्हीं गिनी-चुनी वस्तुओं तक सीमित नहीं है। इसकी पहचान में उन वीरों का अगाध शौर्य भी सम्मिलित है, जो भारतीय सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के लिए हजारों वर्षों से प्रयत्नशील रहे हैं। इसकी मिट्टी से आनेवाली सोंधी-सोंधी खुशबू में उन देशभक्तों के खून की खुशबू भी मिली हुई है, जिन्होंने देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
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