दिन क्या बुरे थे (Din Kya Bure The ): गीत संग्रह ( Geet Sangreh )

· Kalpana Prakashan
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श्री वीरेन्द्र आस्तिक हिन्दी गीत कविता का वह अप्रतिम नाम है, जिससे मेरा जुड़ाव विगत तीन दशकों का है। इन वर्षों में मैं उनकी प्रगति-यात्रा का साक्षी रहा हूँ। देश, दुनिया को वे जिन आँखों से देखते हैं, और उसे अपने गीतों में रूपायित करते हैं, उन आँखों में छिपे दर्द को मैं बराबर महसूस करता हूँ और हर पाठक उसी पीड़ा को भोगता है। उनकी दृष्टि एक ओर जहां कलात्मकता पर जाती है, वहीं दूसरी ओर समाज की विसंगतियों और कुरूपताओं पर भी उसी गहराई से जाती है। अपने गीतों के लिए वे जिन वैज्ञानिक बिंबों का चुनाव करते हैं और जैसी भाषा में वे अपनी बात कहते हैं, सब की सब उनकी अपनी हैं और अपने आस पास से उठाई गई हैं।

जैसा आमतौर पर होता है, किसी गीत-कविता को पढ़ते हुए, किसी और की किसी अन्य कविता की याद आ जाती है, आस्तिक को लगातार पढ़ते हुए मुझे न तो उनकी किसी गीत कविता की याद आती है और न ही किसी अन्य की किसी गीत-कविता की। यह एक ऐसी मौलिकता है जो आस्तिक की अपनी ही है और उन्हीं की रहेगी। उनके भीतर एक दृष्टिसंपन्न आलोचक भी है, जिसमें अप्रिय सत्य को भी कहने का साहस है।

हाँ एक बात और जिस दिन उनसे फोन पर मेरी बात नहीं हो जाती, दिन कुछ अधूरा-अधूरा लगता हैं-अवध बिहारी श्रीवास्तव

बहुत से गीत, नवगीत के शैली-साँचे में बंद न होने के बावजूद नवगीत हो सकते हैं। अनेक नवगीत दिखने में नवगीत जैसे होकर भी अपनी आंतरिक अन्विति के कारण छायावादी होते हैं। वीरेन्द्र आस्तिक की ये रचनाएं गीत और नवगीत के संधि बिंदु पर स्थित होकर भी प्रासंगिक हैं। बहुत प्यारे गीत कहने की अपेक्षा इन्हें बहुत न्यारे गीत कहना अधिक उपयुक्त होगा।            

 -वीरेन्द्र मिश्र

वीरेन्द्र आस्तिक के गीत अंतर्मन के उद्वेलन से स्वतः विस्फूर्जित जान पड़ते हैं। इनमें कृत्तिमता का अभाव है। श्वासों का संस्पर्श पाकर हरे बाँस की बंशी जिस प्रकार पिहुक उठती है, कवि की राग-चेतना से ये गीत कुछ उसी प्रकार फूटे होंगे। इनकी बनाबट और बुनावट बहुत कुछ सहज है। विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि इनमें नवगीत की नई रचनात्मकता है।

-डॅा. रवीन्द्र भ्रमर

‘आनंद, तेरी हार है’ के गीत पढ़े। प्रेम के एकांत क्षणों की यह मार्मिक अनुभूति रसात्मक होकर एक तरल अभिव्यक्ति में साकार हुई है। छंद एवं लय का समन्वय आनंददायक होकर संतोष प्रदान करता है। तुम्हारा कथन-अपनी दृष्टि में संवेदनशील हो पाना मानवता का पहला लक्षण है, मेरे हृदय के अनुकूल है। तुम्हारी इस बात का भी समर्थन करता हूँ कि गीत में लौकिक शब्द योजनाओं, बिंबों-प्रतीकों की पहुँच अलौकिक हो।

- मधुर शास्त्री

भाषा की नई शक्त्तियों के उदघाटन एवं अन्वेषण के साथ अपने गीत संग्रह ‘परछाई के पाँव’ में कवि वीरेन्द्र आस्तिक ने जिन संभावनाओं के प्रति आश्वस्त किया था उनमें प्रमुख रूप से गीत के क्षितिज को अधिकाधिक विस्तार देने की ललक का ही सत्यापन ‘आकाश तो जीने नहीं देता’ -नवगीत संग्रह में फलित हुआ है। इसे आस्तिक की गीत यात्रा का आलोको- ज्जवल चरण कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी। रचनाकार की शिखरोन्मुखी प्रौढ़ गीतधर्मिता का प्रमाण देती हुई संकलित रचनाएं उस समीक्षकीय मिथक को तोड़ती हैं जो गीत और कविता को अलग-अलग विभाजित करने की पक्षधर हैं ।   

- डॅा. शिवबहादुर सिंह भदौरिया

मुझे एक बात और लगती है और बड़े विश्वास के साथ लगती है कि ‘आकाश तो जीने नहीं देता’, केवल नवगीत संग्रह नहीं है, यह पूरा मिशन है, युद्ध का घोषणा-पत्र है, जिसमें गीत-नवगीत अपनी सभी संभावनाओं सार्थकताओं के साथ हथियारबंद है, उस कविता/नई कविता के खिलाफ जो रह-रहकर उसके मरण की घोषणा करती रहती है।         

 - डॅा. देवेन्द्र आर्य (गाजियाबाद)

मैं वीरेन्द्र आस्तिक को उनके गीतकार के आगाज से लेकर आज तक गीतों और समीक्षाओं से परिचित रहा हूँ। देश भर की सभी छोटी-बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में उनके गीतकार (अब नवगीतकार ही कहना उचित होगा) और गीतोत्सवी समर्थ समीक्षक रूप को पढ़ता रहा हूँ। उन्होंने अपने आकर्षक व्यक्तित्व और प्राण-स्पर्शी गीतों के द्वारा अपने संकल्पनिष्ठ शिल्पी को और अधिक सम्मोहक तथा धारदार बनाया है। अविराम साधना की पगडंडियों पर उनके त्रिकालआयामी चरणचिन्ह अपनी अमिट पहचान छोड़ते चले आ रहे हैं। उनकी प्रगति में मेरे जैसे साठ-पैंसठ वर्षों की छन्दोसाधना पुनर्पल्लवित होती दिखे तो मुझे आत्मसंतोष क्यों न हो ?

- देवेन्द्र शर्मा इन्द्र

वीरेन्द्र आस्तिक एक प्रतिभा-संपन्न रचनाकार हैं। कवि के द्वारा रचित नवगीत, प्रतिमानों की कसौटी पर खरे उतरते हैं। उनके गीत संवाद सुलभ भाषा में रचित हैं, तथापि अपनी प्रतीकात्मक भंगिमा और सटीक बिंब विधान के बल पर अर्थ गाम्भीर्य के परिचायक हैं। उनके नवगीतों में थोड़े में बहुत कहने की विलक्षण क्षमता है। उनके अधिकांश गीत अप्रस्तुत विधान में होते हैं, जिसके माध्यम से रचनाकार का अर्थविन्यास बहुत दूर तक जाता है।

- प्रो. विद्यानंदन राजीव

वीरेन्द्र आस्तिक समकालीन गीत संरचना के एक हस्ताक्षर हैं। उनकी संवेदना ओैर विचार का दायरा हमेशा विस्तृत ही होता रहा है। इसका एक अन्य रूप उनके द्वारा संपादित गीत संकलन ‘धार पर हम’ है, जिसमें उनकी संपादन दृष्टि का पता चलता है जो यथार्थ के आंतरिक और बाह्य पक्षों को एक साथ प्रस्तुत करता है, जिसका विकास हमें आकाश तो जीने नहीं देता में प्राप्त होता है। यहाँ यथार्थ बहुस्तरीय है, उसमें पारंपरिकता, इतिहास, जीवन क्रम, सृजन दृष्टि, प्रकृति, लोक, राजनीति, कालबोध, धर्म तथा पारिवारिक बिंब आदि का न्यूनाधिक रचनात्मक परिदृश्य है और इस परिदृश्य में धरती और आकाश के भिन्न रूपाकार अपनी उपस्थिति को दर्ज करते हैं। मेरे विचार से इस गीत संकलन का यह एक महत्वपूर्ण अंग है। क्योंकि यह यथार्थ के भिन्न रूपों को इंगित करता है।

- डॅा वीरेन्द्र सिंह

वीरेन्द्र आस्तिक के ‘आकाश तो जीने नहीं देता’ संकलन की रचनाएं भले ही गीत या नवगीत के रूप में जानी-पहचानी जाएं, संवेदनाओं के जिस बड़े क्षितिज का अहसास हमें कराती हैं, उन्हें समकालीन कविता के किसी भी तेवर में सामने लाया जा सकता है। आस्तिक का रचनाकार एक ओर प्रवहमान समय की निरंतरता के साथ जुड़ा है, दूसरी ओर उसके अपने समय की जो खास पहचान है और विशिष्ट तेवर है, उनसे भी उसका नाता उतना ही गहरा है। आदमी और कविता के परंपरागत जीवित सत्व की पूरी पहचान उसे है, और बावजूद इसके वह हमारे अपने समय का सर्जक है।

- डॅा. शिवकुमार मिश्र


Table of Contents

बूँद-बूँद घट

मेरी गीत यात्रा: पड़ाव-पदचिन्ह......................................... 7

प्रवेश-पथ की पगडण्डी..................................................... 31

अभिव्यक्ति..................................................................... 29      

कविता.......................................................................... 30

कूटाशीष........................................................................ 31

साहित्यिकता.................................................................. 32

वसंत-1......................................................................... 33

वसंत-2......................................................................... 34

घर से लगा बगीचा........................................................... 35

अपना आकाश................................................................. 36

रिश्तों की बाज़ारें............................................................. 37

विण्डो का चक्कर.............................................................. 38

एक पढ़ाकू...................................................................... 39

जंगल का दर्द.................................................................. 40

पथरा गई संवेदना............................................................ 41

इस शहर में.................................................................... 42

रमुआ............................................................................ 43

पर क्यों......................................................................... 45

टप-टप आंसू गिरते........................................................... 46

बस्ती में भगदड़............................................................... 47

वोटर उवाच................................................................... 48

पुतला........................................................................... 49

मेरी कविता के नायक....................................................... 50

यक्ष प्रश्न......................................................................... 51

खबरें............................................................................. 52

यह खबर........................................................................ 53

अप-शब्दों का मान........................................................... 54

खण्डहर-सी घाटी............................................................. 55

नक्सल-बाड़ी.................................................................. 56

दैत्य भरे......................................................................... 57

आतंकी.......................................................................... 59

गाँधी मरा नहीं................................................................ 60

ये मकान........................................................................ 61

जंगल राज...................................................................... 62

सेवाराम........................................................................ 63

उस अपंग से.................................................................... 64

भारत माँ के भाल पर....................................................... 65

माँ................................................................................ 66

पिता............................................................................. 68

ये बच्चे............................................................................ 70

बच्चा.............................................................................. 71

ये लड़कियाँ.................................................................... 72

क्या होती है मां............................................................... 74

कविता बनाम कढ़ी.......................................................... 75

कविता की नई नौकरी...................................................... 77

माँ हूँ माँ........................................................................ 78

मैं जन्मी तो… ................................................................ 79

रधिया बनाम मिस रज़िया................................................. 80

संस्कृति के शस्त्रा.............................................................. 81

वन............................................................................... 82

आदत है जीने की............................................................. 83

पफेपफड़े शहर के............................................................. 84

चमकते पेड़.................................................................... 85

किल्लत ओषजन की......................................................... 86

बाढ़ बवण्डर................................................................... 87

मरना पड़ता है................................................................ 88

बेतरतीब-सी दूकान.......................................................... 90

दिन क्या बुरे थे............................................................... 92

दुनिया हादसा है.............................................................. 93

‘मेमोरी’ का मिटना.......................................................... 95

नौकरी शब्द की............................................................... 96

अपनी बात..................................................................... 98

सारांश बहुत है................................................................ 99

समय जालिम.................................................................. 101

नव संवेदन का महागीत.................................................... 102


श्री वीरेन्द्र आस्तिक हिन्दी गीत कविता का वह अप्रतिम नाम है, जिससे मेरा जुड़ाव विगत तीन दशकों का है। इन वर्षों में मैं उनकी प्रगति-यात्रा का साक्षी रहा हूँ। देश, दुनिया को वे जिन आँखों से देखते हैं, और उसे अपने गीतों में रूपायित करते हैं, उन आँखों में छिपे दर्द को मैं बराबर महसूस करता हूँ और हर पा...

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Renuka Shukla
December 21, 2022
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About the author

वीरेन्द्र सिंह : उपनाम - वीरेन्द्र बाबू और वीरेन्द्र ठाकुर के बाद 1978 से वीरेन्द्र आस्तिक । जन्म : 15-जुलाई, 1947 । गाँव : रूरवाहार (कानपुर जनपद) । पिता : स्व. श्री घनश्याम सिंह सेंगर, माता : स्व. श्रीमती राम कुमारी (परिहार) । प्रकाशन :   सन् 1981 से अब तक पाँच गीत-नवगीत-जनगीत संग्रह । प्रमुख संपादन : धार पर हम (1998), धार पर हम (दो) (2010), भूमिकाएं : 1. गीत-दशक-दो (लखनऊ के दस गीत-नवगीतकारों का संकलन - 2002 ); 2. केनोपनिषद् (ओशो कृत:1989); 3. अवकाश (मां प्रबुद्धानंद कृत आध्यात्मिक कविताओं का संग्रह - 2000) । उपलब्धियां : ‘धार पर हम’ का बडौदा विश्वविद्यालय में एम.ए. (द्वितीय वर्ष) के पाठ्यक्रम में निर्धारण। व्यक्तित्व- कृतित्व पर कई लघु शोध गतिविधियाँ : पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन, आकाशवाणी से प्रसारण, शोधकार्यों में उल्लेख, हिंदी कार्यक्रमों, कवि-सम्मेलनों में भागीदारी ।

संपर्क : एल - 60, गंगा विहार, कानपुर - 208010 . चलभाष : 09415474755, अचल: 0512-2406789 ।

वीरेन्द्र सिंह : उपनाम - वीरेन्द्र बाबू और वीरेन्द्र ठाकुर के बाद 1978 से वीरेन्द्र आस्तिक । जन्म : 15-जुलाई, 1947 । गाँव : रूरवाहार (कानपुर जनपद) । पिता : स्व. श्री घनश्याम सिंह सेंगर, माता : स्व. श्रीमती राम कुमारी (परिहार) । प्रकाशन : सन् 1981 से अब तक पाँच गीत-नवगीत-जनगीत संग्रह । प्रमुख सं...

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