आत्मतत्त्व (Hindi Self-help): Aatmatatwa (Hindi Sahitya)

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स्वामी विवेकानन्दजी के कुछ महत्वपूर्ण व्याख्यान तथा उनके कुछ प्रवचनों का सारांश ''आत्मतत्त्व'' के रूप में पाठकों के सम्मुख है। 'आत्मा', ' आत्मा:उसके बन्धन तथा मुक्ति', 'आत्मा, प्रकृति तथा ईश्वर', ' आत्मा का स्वरूप और लक्ष्य' आदि पुस्तक के विभिन्न, अध्यायों में स्वामीजी ने आत्मा के स्वरूप, उसके बन्धन तथा मुक्ति का विवेचन किया है। स्वामीजी? का कथन है - 'आत्मानुभूति ही वस्तुत: धर्म है।' अत: आत्मा के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर उसकी प्रत्यक्ष उपलब्धि के द्वारा अज्ञान के बन्धनों से मुक्त होना ही मानव-जीवन का चरम लक्ष्य है। आत्मस्वरूप की मीमांसा करनेवाले तीन मत - द्वैत, विशिष्टाद्वैत और अद्वैत का विश्लेषण कर स्वामीजी ने इस पुस्तक में स्पष्टत: दर्शा दिया है कि ये तीनों मत परस्पर विरोधी नहीं, अपितु परस्पर पूरक हैं। स्वामीजी ने इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला है कि आत्मानुभूति प्राप्त करने के लिए बाह्य और आन्तर प्रकृति पर विजय प्राप्त करना आवश्यक हैं तथा यह विजय- लाभ वासना-त्याग एवं अन्तःशुद्धि के बिना सम्भव नहीं। मानव-जीवन के सफल होने के लिए तथा सच्चे सुख एवं शान्ति का अधिकारी बनने के लिए आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्यतया आवश्यक है और इसीलिए इस पुस्तक में स्वामीजी ने जो मार्गदर्शन कराया है वह सभी के लिए निश्यचरूपेण श्रेयस्कर है।
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About the author


स्वामी विवेकानन्द(जन्म: 12 जनवरी,1863 - मृत्यु: 4 जुलाई,1902)

वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् 1893 में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत "मेरे अमरीकी भाइयो एवं बहनों" के साथ करने के लिये जाना जाता है। उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।

 

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4.6
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Additional Information

Publisher
Bhartiya Sahitya Inc.
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Published on
Feb 12, 2014
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Pages
63
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ISBN
9781613013113
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Language
Hindi
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Genres
Foreign Language Study / Hindi
Self-Help / Personal Growth / Happiness
Self-Help / Spiritual
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Content Protection
This content is DRM protected.
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जब प्रेम का यह उच्चतम आदर्श प्राप्त हो जाता है, तो ज्ञान फिर न जाने कहाँ चला जाता है। तब भला ज्ञान की इच्छा भी कौन करे? तब तो मुक्ति, उद्धार, निर्वाण की बातें न जाने कहाँ गायब हो जाती हैं। इस दैवी प्रेम में छके रहने से फिर भला कौन मुक्त होना चाहेगा? ''प्रभो! मुझे धन, जन, सौन्दर्य, विद्या, यहाँ तक कि मुक्ति भी नहीं चाहिए। बस इतनी ही साध है कि जन्म जन्म में तुम्हारे प्रति मेरी अहैतुकी भक्ति बनी रहे।'' भक्त कहता है, ''मैं शक्कर हो जाना नहीं चाहता, मुझे तो शक्कर खाना अच्छा लगता है।'' तब भला कौन मुक्त हो जाने की इच्छा करेगा? कौन भगवान के साथ एक हो जाने की कामना करेगा? भक्त कहता है, ''मैं जानता हूँ कि वे और मैं दोनों एक हैं, पर तो भी मैं उनसे अपने को अलग रखकर उन प्रियतम का सम्भोग करूँगा।'' प्रेम के लिए प्रेम - यही भक्त का सर्वोच्च सुख है
हमारे जीवन का लक्ष्य जैसा भी हो उसे पाने के लिए पहला कदम हमें ही उठाना पड़ता है। एक हजार मील की दूरी तय करने के लिए शुरुआत पहले कदम से ही होती है। इस पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में लिखे अनमोल सफलतम नियमों का पूरा-पूरा लाभ लेने के लिए जरूरी है कि आप बहुत ही धैर्य एवं विश्वास के साथ समझते हुए पढ़ें। अभी तक जिसका लक्ष्य निर्धारित नहीं हुआ होगा तो उसका लक्ष्य तय हो जायेगा और जिसका लक्ष्य निर्धारित होगा तो उसको उसका लक्ष्य पाने का सरल उपाय मिल जायेगा। समस्या किसी भी क्षेत्र से हो उसका समाधान इस पुस्तक को पढ़ते-पढ़ते मिल ही जायेगा। नकारात्मक विचारों में ही सारी समस्याओं का कारण छिपा होता है। समाधान पाने के लिए उन कारणों को कैसे खोजा जाये। इसका तरीका इस पुस्तक में दिया गया है। बेहद सावधानी से इस पुस्तक को पढ़ने की जरूरत है। क्योंकि कब किस पेज पर आपको वह उपाय मिल जाय जिसके मिलते ही आपके मार्ग की कुछ ऐसी बाधाएं समाप्त हो जायें जिनके होने से आपका विकास न हो रहा हो और आप लम्बे समय से उसी स्थान पर रुककर अपने आपसे ही युद्ध लड़ रहे हों। ऐसे संकट के समय में यह पुस्तक आपकी जरूर मदद करने वाली है। इस पुस्तक को छोटे-छोटे अध्यायों में लिखने का उद्देश्य मात्र यह है कि आपका समय धन एवं उर्जा का न्यूनतम् निवेश हो और लाभ की प्राप्ति अधिकतम् हो। टकराव और समस्या का जन्म दूसरों को बदलने के परिणाम स्वरूप होता है। इसलिए समाधान और सफलता पाने के लिए खुद को बदलने के लिए तैयार रहें। हर दिन सफल होने के नियमों पर चलने वाले ही एक दिन महानतम् सफलताओं एवं उपलब्धियों को प्राप्त कर ही लेते हैं। एक दिन में ही अधिकतम् सफलता चाहने वाले लोगों को निश्चित ही नकारात्मक परिणामों के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि यही सृष्टि का अटल नियम है
वस्तुतः जीवन और शिक्षा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। शिक्षा जीवन-पर्यंत चलनेवाली प्रक्रिया है। आदमी जन्म से लेकर मृत्यु-शय्या तक शिक्षा ग्रहण करता रहता है। अलग-अलग विद्वानों ने शिक्षा के अलग-अलग विभाग किए हैं, किंतु प्रमुखतः शिक्षा दो तरह की हो सकती है-एक तो औपचारिक, जो कि एक पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार निर्धारित पाठ्यक्रम और निर्धारित समय-सीमा के अंतर्गत दी जाती है तथा दूसरी अनौपचारिक शिक्षा, जिसे व्यक्ति कहीं भी, किसी से भी, कभी भी ग्रहण कर सकता है। जैसे कि एक कहानी में एक पराजित राजा ने मकड़ी से शिक्षा ग्रहण की और अंततः विजयी हुआ। ये जो बड़े-बड़े ग्रंथ हैं, जिन्हें बड़े-बड़े विद्वानों ने लिखा है-ये भी अनुभवों का संकलन मात्र हैं, जिसका हस्तांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में शिक्षा के माध्यम से होता है। इन ग्रंथों का प्रयोजन यही होता है कि हमारी आनेवाली पीढ़ी को वे दुःख न सहने पड़ें, जो कि अज्ञानतावश उन्होंने सहे हैं। किंतु वर्तमान में यदि हम अपना अवलोकन करें तो हमारी मानसिकता ऐसी हो गई है जिसमें हम पुराने अनुभवों से सीख न लेकर उस विषय पर स्वयं प्रयोग करके सीखने का प्रयास करते हैं। यह अच्छी बात है, किंतु इसकी हानि भी बहुत है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि इसमें एक तो हमारा कीमती समय बरबाद होता है, साथ-ही-साथ कभी-कभी हम केवल प्रयोग के उपकरण मात्र बनकर रह जाते हैं या कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम एक प्रायोगिक शृंखला के सदस्य बन जाने के कारण प्रयोग के बाद अगले प्रयोग में फँसते जाते हैं और अपने जीवन को नष्ट कर देते हैं। इतना सबकुछ जानने के बाद भी हम स्वयं प्रयोग करने में ही ज्यादा आस्था रखते हैं।
हर इनसान की मूल चाहत है स्वयं को जानना किंतु अहंकार, अज्ञान, अध्यान और अनजाने में उसके अंदर ऐसी चाहतें उभरकर आती हैं, जिनकी कोई सच्ची बुनियाद नहीं है। अनगिनत और अनावश्यक इच्छाओं के भँवर में फँसकर इनसान का जीवन किस ओर जा रहा है, यह वह देख ही नहीं पा रहा है। मान्यता और माया के शिकंजे में उसके जीवन की क्वालिटी समाप्त होती जा रही है। इस पुस्तक द्वारा आप में ऐसी जागृति लाई जा रही है, जिससे आपका होश इतनी ऊँचाई पर जाए कि सूक्ष्म-से-सूक्ष्म इच्छा भी आपकी पकड़ में आए। इसके लिए आपको प्रेरणा पानी है एक चिडि़या से। जिस तरह चिडि़या एक-एक तिनका चुनकर अपना आशियाना बनाती है, उसी तरह आपको भी अपनी एक-एक इच्छा के साथ खोज कर, उसके पीछे छिपी मान्य कथा को मिटाना है। ऐसे में जो शरीर रूपी आशियाना बनेगा, वह सेल्फ के लिए वाकई ध्यानकक्ष, मौनकक्ष, अभिव्यक्ति कक्ष, दर्पणकक्ष, एग्जीबीशन कक्ष होगा, जिसमें केवल आनंद-ही-आनंद होगा। शुभ इच्छा पूरी होने का आनंद!
निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज को ‘भक्तियोग’ कहते हैं। इस खोज का आरंभ, मध्य और अंत प्रेम में होता है। ईश्वर के प्रति एक क्षण की भी प्रेमोन्मत्तता हमारे लिए शाश्वत मुक्ति को देनेवाली होती है। ‘भक्तिसूत्र’ में नारदजी कहते हैं, ‘‘भगवान्् के प्रति उत्कट प्रेम ही भक्ति है। जब मनुष्य इसे प्राप्त कर लेता है, तो सभी उसके प्रेमपात्र बन जाते हैं। वह किसी से घृणा नहीं करता; वह सदा के लिए संतुष्ट हो जाता है। इस प्रेम से किसी काम्य वस्तु की प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जब तक सांसारिक वासनाएँ घर किए रहती हैं, तब तक इस प्रेम का उदय ही नहीं होता। भक्ति कर्म से श्रेष्ठ है और ज्ञान तथा योग से भी उच्च है, क्योंकि इन सबका एक न एक लक्ष्य है ही, पर भक्ति स्वयं ही साध्य और साधन-स्वरूप है।’’ —(नारदभक्तिसूत्र)
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