Tigers of Sundarbans (सुंदरवन के बाघ)

Creative Grove
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Additional Information

Publisher
Creative Grove
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Published on
Feb 4, 2014
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Pages
153
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Language
Hindi
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Genres
Comics & Graphic Novels / Fantasy
Nature / Environmental Conservation & Protection
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 1979 में, आजसे 38 साल पहले, सोचा भी नहीं था कि किसी दिन ऐसी तक़नीक़ आएगी कि कभी सिर्फ़ एक प्रति में छपनेवाली एक पत्रिका दुनिया-भर में पढ़वाई जा सकेगी! इस पत्रिका को छापने की उधेड़-बुन में अचानक एक दिन यह भी याद आया कि ऐसे काम मैंने कई बार किए हैं कि बिना इस बात की चिंता/परवाह किए कि मुझसे पहले यह काम किसीने किया है कि नहीं, मैं अपनी ओर से शुरु कर देता हूं। फिर चाहे वह छोटे-से क़स्बे में बिना कुछ जाने-सीखे, सिर्फ़ क्रिएटिव-कल्पना-सामर्थ्य के चलते, फ़ैशन-डिज़ाइनिंग शुरु कर देना हो, कलात्मक विज़िटिंग कार्डस बनाना शुरु करना हो या बैंक में प्रोबेशनरी ऑफ़िसर की लिखित परीक्षा पास कर लेने के बावज़ूद दर्ज़ी की दुकान खोल लेना हो, सामुदायिक ब्लॉग ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ के शुरु होने के बाद बाक़ी सदस्यों की लगभग 10 दिन तक छाई चुप्पी तोड़ते हुए पहली पोस्ट, एक नई स्थापना, नये विचार के साथ लिख देना हो या लोगों की चेतावनियों/धमकीनुमांओं के बावज़ूद फ़ेसबुक पर 

नास्तिकTheAtheist ( https://www.facebook.com/groups/589510514401889/ )  ग्रुप 

और 

गूगल-ब्लॉग ( https://nastiktheatheist.blogspot.in/ ) शुरु कर देना हो......


‘बच्चों के नवनिर्माण का मासिक ‘निर्माण’ नामक यह हस्तलिखित पत्रिका शुरु करते समय भी मुझे नहीं मालुम था कि इससे पहले ऐसा किसीने किया है या नहीं....


बहुत सारे लोगों का सहयोग और मेहनत इसमें लगे हैं, इसलिए सोचा कि इसे मुफ़्त ही बेचा जाए....


*निर्माण के संदर्भ में कुछ मज़ेदार बातें*


1. कुछ बचपना भी था- निर्माण शीर्षक भारत सरकार द्वारा रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क है..... इसीका नतीजा है।

2. ‘निर्माण’ की चूंकि एक ही प्रति छपती/लिखी जाती थी इसलिए मित्र-परिचित-रिश्तेदार-सहेलियां-मोहल्लेवाले सब बारी-बारी से (मुफ्त में) इसे पढ़ने के लिए ले जाते थे। इसके बावजूद पत्रिका की भौतिक स्थिति अभी भी ठीक-ठाक है।

3. जैसे-जैसे याद आएंगी, अन्य रोचक जानकारियां आपको देता रहूंगा।


तब तक आप आराम से पढ़िए....


-संजय ग्रोवर

24-05-2017

एक धनी यूनानी परिवार में जन्म होने पर भी, अलेसिया अपनी माँ के साथ सादगी की ज़िन्दगी गुज़ार रही थी क्योंकि उसके निर्दयी दादा ने उन्हें घर से निकल दिया था. फिर, १५ सालों में पहली बार, अलेसिया के दादा ने उसे अपने पास बुलवाया सिर्फ़ यह बताने के लिए कि उसके वर का चुनाव हो चुका है. उनकी ज़िद है कि वह शादी करे सेबेस्टियन फ़िओरुकिस से, जो दूसरे धनी परिवार का ज्येष्ठ पुत्र है. दोनों परिवारों की दो पीढ़ियों से ठनी हुई है, तो आखिर दादा कौन सा तिकड़म लगा रहे हैं? पर अगर वह यह प्रस्ताव स्वीकार ले, तो उसकी माँ की जान बच सकती है. अलेसिया न चाहते हुए भी मान जाती है, लेकिन उसे नहीं पता उसका नया मंगेतर उसके साथ कैसा बरताव करेगा...
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