Jogiyon Ka Teela: जोगियों का टीला

Shubhda Prakashan
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-''यदि तुझे लगता है कि मरदानगी दिखाने से कुछ होगा तो ले मैं यही करता हूँ।'' हरखू ने भी चीखकर कहा। इसी के साथ छपाक की आवाज हुई और बीसियों कण्ठ चीख पड़े- ''अरे क्या करता है हरखू? मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता।'' लेकिन तब तक हरखू काले अंधकार में पागल शिकारी की तरह चक्कर काटते हुए पानी के साथ वेग पूर्वक बह गया था।

-''हाय-हाय ये मैंने क्या कर डाला?'' और भी जोर से बिलख उठी रतिया।

-''पागल औरत इसी तरह अपना घर बरबाद करती है।'' वृद्ध जोगिन ने बिफर कर रतिया की प्रताड़ना की।

-''एक तो मौत सिर पर खड़ी है और उस पर जोगियों की मत मारी गयी है जो जान बचाने की चिंता न करके इस तरह आपस में लड़ रहे हैं।'' वृद्ध जोगिन के पति ने जोगियों की वर्जना की।
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About the author

  डॉ. मोहनलाल गुप्ता आधुनिक युग के बहुचर्चित एवं प्रशंसित लेखकों में अलग पहचान रखते हैं। उनकी लेखनी से अब तक पांच दर्जन से अधिक पुस्तकें निृःसृत  हुई हैं जिनमें से अधिकांश पुस्तकों के कई-कई संस्करण प्रकाशित हुए हैं। 


डॉ. गुप्ता हिन्दी साहित्य के जाने-माने व्यंग्यकार, कहानीकार, उपन्यासकार एवं नाट्यलेखक हैं। यही कारण है कि उनकी सैंकड़ों रचनाएं मराठी, तेलुगु आदि भाषाओं में अनूदित एवं प्रकाशित हुईं। 

इतिहास के क्षेत्र में उनका योगदान उन्हें वर्तमान युग के इतिहासकारों में विशिष्ट स्थान देता है। वे पहले ऐसे लेखक हैं जिन्होंने राजस्थान के समस्त जिलों के राजनैतिक इतिहास के साथ-साथ सांस्कृतिक इतिहास को सात खण्डों में लिखा तथा उसे विस्मृत होने से बचाया। इस कार्य को विपुल प्रसिद्धि मिली। इस कारण इन ग्रंथों के अब तक कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं तथा लगातार पुनर्मुद्रित हो रहे हैं। 

डॉ. मोहनलाल गुप्ता ने भारत के विशद् इतिहास का तीन खण्डों में पुनर्लेखन किया तथा वे गहन गंभीर तथ्य जो विभिन्न कारणों से इतिहासकारों द्वारा जानबूझ कर तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किए जाते रहे थे, उन्हें पूरी सच्चाई के साथ लेखनीबद्ध किया एवं भारतीय इतिहास को उसके समग्र रूप में प्रस्तुत किया। भारत के विश्वविद्यालयों में डॉ. गुप्ता के इतिहास ग्रंथ विशेष रूप से पसंद किए जा रहे हैं। इन ग्रंथों का भी पुनमुर्द्रण लगातार जारी है। 

राष्ट्रीय ऐतिहासिक चरित्रों यथा- अब्दुर्रहीम खानखाना, क्रांतिकारी केसरीसिंह बारहठ, महाराणा प्रताप, महाराजा सूरजमल,सवाई जयसिंह,भैंरोंसिंह शेखावत, सरदार पटेल तथा राव जोधा आदि पर डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा लिखी गई पुस्तकों ने भारत की युवा पीढ़ी को प्रेरणादायी इतिहास नायकों को जानने का अवसर दिया। 

प्रखर राष्ट्रवादी चिंतन, मखमली शब्दावली और चुटीली भाषा, डॉ. मोहनलाल गुप्ता द्वारा रचित साहित्य एवं इतिहास को गरिमापूर्ण बनाती है। यही कारण है कि उन्हें महाराणा मेवाड़ फाउण्डेशन से लेकर मारवाड़ी साहित्य सम्मेलन मुम्बई, जवाहर कला केन्द्र जयपुर तथा अनेकानेक संस्थाओं द्वारा राष्ट्रीय महत्व के पुरस्कार दिए गए। 

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Additional Information

Publisher
Shubhda Prakashan
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Pages
23
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ISBN
9788193382998
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Best For
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Language
Hindi
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Genres
Fiction / Short Stories (single author)
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 इस पुस्तक में दो व्यंग्य कहानियां हैं। मजनूं का कटोरा में एक ऐसी लड़की की कहानी है जो व्हाट्स एप पर आने वाले संदेशों को पढ़कर मजनूं से प्रेम करने लगती है और अपने पिता से बगावत करती है किंतु जब उसे ज्ञात होता है कि मजनूं, अपनी लैला के लिये किंचित् भी कष्ट उठाने को तैयार नहीं है और उसने व्हाटसैप तथा फेसबुक पर जो संदेश भेजे थे, वे तो कहीं ओर से आये हुए थे जिन्हें मजनूं, लैला को केवल फॉरवर्ड कर रहा था तो लैला की आंखें खुल जाती हैं और वह मजनूं से विमुख होकर अपने पिता के गले लग जाती है।

अंतिम उपदेश ऐसे महात्मा की कहानी है जो यह समझता है कि सद्उपदेश से भेड़ियों को भी अच्छा बनाया जा सकता है। ढोंगी भेड़िये महात्माजी की इस मान्यता का दुरुपयोग करते हैं। महात्माजी चाहते हैं कि जिस प्रकार भेड़ियों पर सदुपदेशों का प्रभाव हुआ है, हरिण शावक भी उनकी इस भावना को समझें किंतु लाख प्रयास करने पर भी हरिण शावक महात्माजी की बात का विश्वास नहीं करते। एक दिन भेड़िये ढोंग छोड़कर सीधे ही महात्माजी पर आक्रमण कर देते हैं तब जाकर महात्माजी को भेड़ियों की सच्चाई का ज्ञान होता है किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

देश की तत्कालीन परिस्थितियों पर पढ़िये आधुनिक समय के प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ. मोहनलाल गुप्ता के दो व्यंग्य।

मुंशी प्रेमचन्द एक व्यक्ति तो थे ही, एक समाज भी थे, एक देश भी थे। व्यक्ति समाज और देश तीनों उनके हृदय में थे। उन्होंने बड़ी गहराई के साथ तीनों की समस्याओं का अध्ययन किया था। प्रेमचन्द हर व्यक्ति की, पूरे समाज की और देश की समस्याओं को सुलझाना चाहते थे, पर हिंसा से नहीं, विद्रोह से नहीं, अशक्ति से नहीं और अनेकता से भी नहीं। वे समस्या को सुलझाना चाहते थे प्रेम से, अहिंसा से, शान्ति से, सौहार्द से, एकता से और बन्धुता से। प्रेमचन्द आदर्श का झण्डा हाथ में लेकर प्रेम एकता, बन्धुता, सौहार्द और अहिंसा के प्रचार में जीवन पर्यन्त लगे रहे। उनकी रचनाओं में उनकी ये ही विशेषतायें तो है। प्रेमचन्द जनता के कथाकार थे उनकी कृतियों में समाज के सुख-दुःख, आशा-आकाँक्षा, उत्थान-पतन इत्यादि के सजीव चित्र हमारे हृदयों को झकझोरते हैं। वे भारत के प्रमुख कथाकार थे, जिनको पढ़े बिना भारत को समझना संभव नहीं। भारतीय साहित्य संग्रह ने उनकी 322 कहानियों को इस ‘प्रेमचन्द की कहानियां’ श्रृंखला के 46 भागों में सुधी पाठकों पाठकों को उपलब्ध कराने का प्रयास किया है। - प्रकाशक
उनके पुरखे जलजला ला देने वाली ताकत के मालिक थे और वे आठ सौ सालों से तलवार चला रहे थे। उनकी सेनाओं ने बगदाद और खुरासान से चलकर, हिन्दूकुश पर्वत पार कर लिया था और अब वे गंगा-जमुना के मैदानों पर राज कर रहे थे किंतु गुहिलों का अरावली पहाड़ अब तक उनकी पहुंच से बाहर था। खुरासान से आया बादशाह अकबर, अरावली के गर्वित मस्तक को झुकाने के लिये कृतसंकल्प था।

आठ सौ सालों से खुरासानियों से मोर्चा ले रहे गुहिल भी तैयार थे। हल्दीघाटी में एक अवसर था जब, गुहिल इस लड़ाई को उसके अंतिम परिणाम तक पहुंचा देते किंतु स्थितियां तब विषम हो गईं जब सदियों से गुहिलों के अधीन रहकर देश के शत्रुओं से लड़ते आ रहे उत्तर भारत के क्षत्रिय राजाओं ने अकबर की चाकरी स्वीकार कर ली। वे भी अकबर की सहायता के लिए महाराणा प्रताप के विरुद्ध अपनी तलवारें ले आए थे।

महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी। वह लड़ा और तब तक लड़ता रहा जब तक उसने अकबर से मेवाड़ का चप्पा-चप्पा नहीं छीन लिया। पढ़िये रोंगटे खड़े करने वाले इस युद्ध का इतिहास, आधुनिक समय के सबसे चर्चित इतिहासकार डॉ. मोहनलाल गुप्ता की लेखनी से।
बादशाह अकबर के दरबार के रत्न बीरबल अत्यधिक व्यवहार-कुशल ईमानदार और विवेकबुद्धि से संपन्न इंसान थे, अपनी बुद्धि के बल पर उन्होंने अकबर बादशाह के दरबार में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। उनके ज्ञान और प्राप्त सम्मान के कारण अन्य दरबारी उनसे ईर्ष्या करते थे और अनेक बार उन्हें नीचा भी दिखाने का प्रयास भी करते थे, किंतु बीरबल अपनी हाज़िरजवाबी तथा प्रवीणता के कारण बार-बार उनके प्रहारों से बच निकलते थे। ऐसा कहा जाता है कि कई बार बीरबल की अनुपस्थिति से दरबार सूना-सूना लगता था और बादशाह अकबर भी उदास हो जाते थे। इन्हीं बीरबल की हाज़िरजवाबी का एक उदाहरण है प्रस्तुत पुस्तक, जिसमें बीरबल ने विभिन्न अवसरों पर अनेक समस्याओं को भी हल किया है
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