मेरे लिए सिर्फ एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक लंबे चिंतन की यात्रा है। यह पुस्तक दर्शन(Philosophy) और विकासवाद(Evolution) — इन दो धाराओं को साथ रखकर लिखी गई है। एक धारा प्रश्न पूछती है — “क्यों?” और दूसरी खोजती है — “कैसे?” मुझे लगा कि जब तक ये दोनों एक साथ नहीं बैठते, तब तक हमारी समझ अधूरी रहती है।मनुष्य ने हमेशा अपनी शुरुआत के बारे में सोचा है। क्या हम केवल जैविक विकास का परिणाम हैं? या हमारे भीतर कुछ ऐसा भी है जो केवल पदार्थ से परे है? इस पुस्तक में मैंने विज्ञान को अस्वीकार नहीं किया, और न ही दर्शन को अंधविश्वास में बदला है। मेरा प्रयास केवल इतना रहा है कि विचार और प्रमाण, दोनों को एक ही संवाद में रखा जाए।
मेरे लिए सिर्फ एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक लंबे चिंतन की यात्रा है। यह पुस्तक दर्शन(Philosophy) और विकासवाद(Evolution) — इन दो धाराओं को साथ रखकर लिखी गई है। एक धारा प्रश्न पूछती है — “क्यों?” और दूसरी खोजती है — “कैसे?” मुझे लगा कि जब तक ये दोनों एक साथ नहीं बैठते, तब तक हमारी समझ अधूरी रहती है।मनु...