Poems on Smt. Gayatri Devi & Pt. K.L. Misra: कविता श्रीमती गायत्री देवी व पंडित कन्हैया लाल मिश्रा

Osmora Incorporated
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यह कविता श्रीमती गायत्री देवी के देहांत उपरांत पंडित कन्हैया लाल मिश्रा द्वारा रचित की गयी है।

The poem was written by Pt. Kanhaiya Lal Misra after the demise of his wife Smt. Gayatri Devi

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About the author

Pt. Kanhaiya Lal Misra was the Advocate General of (U.P.) India, from 1952 to 1969

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5.0
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Additional Information

Publisher
Osmora Incorporated
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Published on
Nov 9, 2017
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Pages
10
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ISBN
9782765930709
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Language
Hindi
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Genres
Family & Relationships / Death, Grief, Bereavement
Poetry / Asian / General
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 इस किताब में वो कविताये है, जिन्हें मैंने वफ़ा, आत्मा, सच, सब के कहने से लिखा, कई तस्वीरे बनी इस बीच मेरे सामने और कई अजीब सच देखे मैंने ये कवितायें लिखी मैंने सच की ताकत और आत्मा की गहराई, लोगो को इबादत करते देखा, मैंने इस किताब को लिखने के लिए बहुत शब्द देखे है वही शब्द मिले आत्मा , सच, तुम, से मिलकर ये किताब लिख दी, कई कविताये लिखी, सच लिखे और कई सच, झूठ के जिक्र हुए मगर जिंदगी के असली चेहरे का जिक्र नहीं हुआ, वो दिखती कैसी है, मैं फिर से नई खोज में निकला हूँ कि वो दिखती कैसी है? मैं अपने आप से कई बार मिला मगर उसने कभी सच का जिक्र नहीं किया, उसकी शक्ल का भी जिक्र नहीं किया, और भी कई सचो को जानने के लिए मैं फिर से नए रास्ते पर चल पड़ा ,ये किताब में भी उन्ही कुछ सोचो का जिक्र है जिन्हें अब तक मैंने देखा।
 ‘ठण्डा लोहा’ धर्मवीर भारती की प्रारम्भिक कविताओं का संग्रह है। इस संग्रह की कविताओं की अन्तरंग दुनिया ऐसे अनुभूति-केन्द्र पर उजागर हुई है जहाँ दिन-महीने और बरस उसकी ताजगी और महमहाते टटकेपन को रंचमात्र भी मैला नहीं कर पाते। स्वयं भारती जी के शब्दों में—‘‘इस संग्रह में दी गयी कविताएँ मेरे आरम्भिक छह वर्षों की रचनाओं में से चुनी गयी हैं और चूँकि यह समय अधिक मानसिक उथल-पुथल का रहा, अतः इन कविताओं में स्तर, भावभूमि, शिल्प और टोन की काफी विविधता मिलेगी। एकसूत्रता केवल इतनी है कि सभी मेरी कविताएँ हैं, मेरे विकास और परिपक्वता के साथ उनके स्वर बदलते गये हैं; पर आप जरा ध्यान से देखेंगे तो सभी में मेरी आवाज पहचानी-सी लगेगी।....मेरी परिस्थितियाँ, मेरे जीवन में आने और आकर चले जानेवाले लोग, मेरा समाज, मेरा वर्ग, मेरा संघर्ष, मेरी समकालीन राजनीति और साहित्यिक प्रवृत्तियाँ, इन सभी का मेरे और मेरी कविता के रूप-गठन और विकास में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भाग रहा है।....किशोरावस्था के प्रणय, रूपासक्ति और आकुल निराशा से एक पावन, आत्मसमर्पणमयी वैष्णव भावना और उसके माध्यम से अपने मन के अहम् का शमन कर अपने से बाहर की व्यापक सचाई को हृदयंगम करते हुए संकीर्णताओं और कट्टरता से ऊपर एक जनवादी भावभूमि की खोज–मेरी इस छन्द-यात्रा के प्रमुख मोड़ रहे हैं।’’
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