Nirmaan-4/निर्माण-4: Children's Magazine/बच्चों की पत्रिका

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 1979 में, आजसे 38 साल पहले, सोचा भी नहीं था कि किसी दिन ऐसी तक़नीक़ आएगी कि कभी सिर्फ़ एक प्रति में छपनेवाली एक पत्रिका दुनिया-भर में पढ़वाई जा सकेगी! इस पत्रिका को छापने की उधेड़-बुन में अचानक एक दिन यह भी याद आया कि ऐसे काम मैंने कई बार किए हैं कि बिना इस बात की चिंता/परवाह किए कि मुझसे पहले यह काम किसीने किया है कि नहीं, मैं अपनी ओर से शुरु कर देता हूं। फिर चाहे वह छोटे-से क़स्बे में बिना कुछ जाने-सीखे, सिर्फ़ क्रिएटिव-कल्पना-सामर्थ्य के चलते, फ़ैशन-डिज़ाइनिंग शुरु कर देना हो, कलात्मक विज़िटिंग कार्डस बनाना शुरु करना हो या बैंक में प्रोबेशनरी ऑफ़िसर की लिखित परीक्षा पास कर लेने के बावज़ूद दर्ज़ी की दुकान खोल लेना हो, सामुदायिक ब्लॉग ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ के शुरु होने के बाद बाक़ी सदस्यों की एक महीने तक छाई चुप्पी तोड़ते हुए पहली पोस्ट, एक नई स्थापना, नये विचार के साथ लिख देना हो या लोगों की चेतावनियों/धमकीनुमांओं के बावज़ूद फ़ेसबुक पर नास्तिकTheAtheist ( https://www.facebook.com/groups/589510514401889/ )  ग्रुप और गूगल-ब्लॉग ( https://nastiktheatheist.blogspot.in/ )शुरु कर देना हो......


‘बच्चों के नवनिर्माण का मासिक ‘निर्माण’ नामक यह हस्तलिखित पत्रिका शुरु करते समय भी मुझे नहीं मालुम था कि इससे पहले ऐसा किसीने किया है या नहीं....

बहुत सारे लोगों का सहयोग और मेहनत इसमें लगे हैं, इसलिए सोचा कि इसे मुफ़्त ही बेचा जाए....

विस्तार से बातचीत कुछ देर में-

तब तक आप आराम से पढ़िए....

-संजय ग्रोवर

24-05-2017

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About the author

 ʘ SANJAY GROVER संजय ग्रोवर :

ʘ सक्रिय ब्लॉगर व स्वतंत्र लेखक.

ʘ Active Blogger and Freelance Writer.

ʘ मौलिक और तार्किक चिंतन में रुचि.

ʘ Inclined toward original and logical thinking.

ʘ नये विषयों, नये विचारों और नये तर्कों के साथ लेखन.

ʘ loves writing on new subjects with new ideas and new arguments.

ʘ फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी सक्रिय.

ʘ Also active on Facebook and Twitter.

ʘ पत्र-पत्रिकाओं में कई व्यंग्य, कविताएं, ग़ज़लें, नारीमुक्ति पर लेख आदि प्रकाशित.

ʘ Several satires, poems, ghazals and articles on women's lib published in various journals.

ʘ बाक़ी इन व्यंग्यों को पढ़कर जानें :-)

ʘ Rest ...learn by reading the book :-)

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Reviews

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Additional Information

Publisher
Sanjay Grover
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Published on
May 24, 2017
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Pages
50
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Language
Hindi
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Genres
Comics & Graphic Novels / Manga / Children's Books & Fairy Tales
Family & Relationships / Parenting / Parent & Adult Child
Psychology / Psychotherapy / Child & Adolescent
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Content Protection
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Sanjay Grover संजय ग्रोवर
 क्या आपने बाल सीक्रेट एजेंट अमित, असलम और अल्बर्ट के नाम सुने हैं ?
 

चिंता न करें, संभावना यही है कि मैंने भी ये नाम तभी सुने होंगे जब मैंने इस उपन्यास को लिखने की सोची होगी। अंदाज़न क़रीब 35-36 साल पहले की ही बात.......। अजीब दिन थे मगर उनके बारे में सोचना दिलचस्प लगता है। कभी मैं ख़्यालों-ख़्यालों में कर्नल विनोद की तरह ख़ुदको किसी मुसीबतज़दा के पास अचानक मौजूद हुआ पाता तो कभी खाट या मेज पर चढ़कर स्लो मोशन में कूदने की कोशिशें और तरक़ीबें किया करता। फ़िल्मों और क़िताबों का गहरा असर उनके बीच में रहते-रहते और उन्हें पढ़ते देखते हो रहा/गया था। कोई देख न ले, पिताजी डांट न मार दें, इस डर से कभी अकेले, कमरे के अंधेरों में तो कभी बुख़ार में रात को रज़ाई और मंद पीली रोशनी में पढ़ते-लिखते अनगिनत दिन काटे। आप सोचिए, एक तरफ़ यह डर कि पिताजी न आ जाएं तो दूसरी तरफ़ छाती में बजती धुकधुकी कि उपन्यास के अंधेरे में कब कोई साया कूद पड़े......। आपमें से भी कई दोस्त इस तरह की ‘मुश्क़िलों’ और ‘संघर्षों’ से ग़ुज़रे होंगे। 

इस बाल उपन्यास को कई सालों बाद फिर से पढ़ते हुए यह तो समझ में आ ही रहा है कि इसपर उस वक़्त के कई लोकप्रिय जासूसी और सामाजिक उपन्यासकारों का प्रभाव है, साथ ही यह भी अच्छा लग रहा है कि अंधविश्वासों, टोनों-टोटकों, बाबाओं और तथाकथित भगवानों आदि को लेकर शुरु से ही एक ख़ुला दृष्टिकोण मेरे पास उपलब्ध था।

उस वक़्त कई जासूसी सीरीज़ चला करतीं थीं जैसे आशु-बंटी-निशा, राजन-इक़बाल, राम-रहीम, कृष्ण-क़रीम, विनोद-हमीद, मेजर बलवंत एंड कंपनी.....। मैंने भी, संभवतः ‘भारतीय धर्मनिरपेक्षता’ के ‘प्रभाव’ में भी, अमित-असलम-अल्बर्ट की सीरीज़ गढ़ ली। अनुप्रास अलंकार से भाषा को सजाने में मेरी रुचि भी आप इन नामों में देख सकते हैं। कभी अनंत तो कभी किसी और नाम से मैं उस समय लिखा करता और अन्य क्रिएटिव काम भी करता रहता।

35-36 साल पुरानी इस हस्तलिखित क़ाग़ज़ी मूल प्रतिलिपि की हालत पहले भी बहुत अच्छी नहीं थी तो कुछ स्कैनिंग के दौरान भी ढीली हो गई। तसल्ली यही है कि (लगभग)एक-एक शब्द साफ़ पढ़ने में आ रहा है। इसलिए मुखपृष्ठ को ज़रा-सा सुधारने के अलावा बाक़ी कहीं मैंने हाथ भी नहीं लगाया, जैसा का तैसा पब्लिश कर दिया है।

अपने समय के कई लटकों-झटकों से भरी यह क़िताब अब आपके सामने है।

-संजय ग्रोवर
19-11-2016

Sanjay Grover संजय ग्रोवर
 The cloth was reversible, looking like Blue Denim and the inner side was gray. My father was a wholesale cloth merchant. He used to inform us whenever  fancy cloths were available within the shop. 'Why should not I design it myself', seeing the cloth the thought came to my mind. There was only one showroom for readymade garments in the town, which used to make us greedy by showing its stylish and colourful garments. We were almost lower-middle-class people (still.I am the same), so it was not possible for us  to buy expensive things daily or monthly. When I illustrated my design before tailor, he was not ready to stitch, and mocked also at me. According to my idea, shirt must be gray and will have design of blue on it and the pants/jeans would be vice versa.  I persisted continuously and he was convinced finally. In this way I opened my innings. Before this I used to get my school-bags and sweaters (designed by me) stitched/woven by my mother or sisters.


One day I was in a tailor's shop for getting repaired my canvas jeans’ zip. After repair I asked how much money I had to pay? He told with a miny smile that money did not matter but your heavy jeans destroyed two of my needles, so give me two rupees only. By saying so he touched my heart. It was beginning of a friendship. In the beginning I convinced my   friends-relatives-acquaintances somehow and decorated my designs on their bodies. I remember I created some stylish Khadi(kind of an Indian cotton) shirts within 50 rs of budget(including stitching charges). Naturally, whenever any third person would praise the style/design, the shirt-owner returned to me for a new design.

Then I started to illustrate these designs in a diary. Also created a new name for myself - KG Sanjay. Mostly I used to create one design for one particular person. Sometimes people selected one from readymade designs.The same designs are now safe in this diary. Most of designs are created in 1984-85. Pages of the lined diary (I got as a gift with my first bicycles in 1979) got yellow and blury, Actually At that time I could not know exactly what to do with diary and designs thereafter! In fact even I did not know that Fashion designing is a profession or there are some courses for it. NIFT (National Institute of Fashion Technology) had been established later.

Thankfully I got an app like SuperPhoto-Free which made these pictures quite clear, attractive and impressive. Originally these designs had been created for Gents' shirts and jackets, but these can be used easily in place of each other. As far as I am concerned, can create a few new designs from these and can also beautifully convert these into T-shirts or Ladies Garments. Few of these designs I made with old and useless clothes like design no. 118 had been made of two waste pants and an old jacket. You too can try this if you are creative and imaginative somewhere inside. In inverted (white in black), there are many designs where you can try painting, screen printing, patchwork, embroidery etc. The original sketch is also there with each design.

See you again with a new attempt. Of course, there will be a new job and most probably this will be for women's clothings. It will take some time but hopefully something new and different will come out.

The first part of the old and yellow diary is now in your hands-

with best wishes,

-Sanjay Grover

2017-06-06/13

(To be continued & corrected)

कपड़ा देखने में ब्ल्यू डेनिम जैसा था, अंदर ग्रे कलर था। पिताजी की कपड़ों की दुकान थी यानि कि होलसेल क्लॉथ मर्चेंट थे। जब कभी दुकान पर कोई फ़ैंसी कपड़ा आता, वे घर ले आते थे। इस कपड़े को देखकर मन हुआ क्यों न इसका डिज़ाइन ख़ुद ही बनाया जाए। शहर में रेडीमेड कपड़ों का एक ही शोरुम था, जहां टंगे रंग-बिरंगे, अलग-अलग डिज़ाइनों वाले कपड़े देखकर मन ललचा जाता। हम लगभग निम्नमध्यवर्गीय लोग थे, इसलिए आए दिन महंगी चीज़ें खरीदना संभव नहीं था (अभी भी मैं वही हूं)। मैंने दर्ज़ी को डिज़ाइन बताया तो वह तैयार ही न हुआ, हंसने लगा। मैं कह रहा था कि ग्रे कलर की शर्ट और उसपर ब्ल्यू से डिज़ाइन और पैंट पर ठीक इसका उल्टा करना है। मैं ज़िद करता रहा और अंततः वह मान गया। इस तरह डिज़ाइनिंग की शुरुआत हो गई। उससे पहले घर पर अपने ड़िज़ाइन किए स्वेटर, स्कूल बैग आदि बनवाता रहता था।


एक दिन  कैनवास की एक जींस पर ज़िप लगवाने एक दर्ज़ी के पास गया। काम करवाने के बाद पैसे पूछे तो उसने कहा कि पैसे तो क्या लेने हैं मगर इस मोटी जींस पर दो सुई टूट गईं हैं, दो रुपए दे दो। बात दिल को छू गई। दर्ज़ी लड़का-सा ही था। आना-जाना शुरु हो गया। दोस्तों-रिश्तेदारों-परिचितों को शुरु में तो कभी-कभी ज़बरदस्ती ही, किसी भी तरह कन्विंस करके, डिज़ाइन वाले कपड़े पहना देता था। मुझे याद है कि ख़ादी की स्टाइलिश शर्टें मैंने लोगों को, सिलाई समेत, पचास-पचास रुपए में पहनाई थी। ज़ाहिर कि जब कोई तीसरा तारीफ़ करता तब वे दूसरे फिर लौटकर अगला कपड़ा डिज़ाइन करवाने मेरे पास आ जाते।

फिर मैंने ये डिज़ाइन एक डायरी में दर्ज़ करने शुरु कर दिए। अपना एक नया नाम भी रख लिया- के.जी.संजय। ज़्यादातर एक डिज़ाइन एक व्यक्ति के लिए बनाया जाता। अकसर मैं कपड़ा देखकर डिज़ाइन बनाता या कभी-कभी लोग बने हुए डिज़ाइनों में से ही कोई चुन लेते। वही सब डिज़ाइन इस डायरी में सुरक्षित हैं। ज़्यादातर डिज़ाइन 1984-85 के हैं। हीरो साइकिल के साथ मिली 1979 की इस लाइनोंवाली डायरी के पन्ने पीले पड़ गए हैं, स्केच धुंधला गए हैं क्योंकि उस वक़्त मुझे मालूम नहीं था कि इसका कब तक, क्या और कैसा इस्तेमाल होगा ? सही बात तो यह कि उस वक़्त मुझे यह भी मालूम नहीं था कि फ़ैशन डिज़ाइनिंग कोई कैरियर/प्रोफ़ेशन है और इसकी कोई पढ़ाई/कोर्स भी होती/होता है। निफ़्ट यानि कि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ैशन टैक्नोलॉजी काफ़ी बाद में ख़ुला था।



शुक्र है कि सुपरफ़ोटो-फ़्री जैसा ऐप मुझे मिला जिससे कि ये रेखांकन काफ़ी स्पष्ट, आकर्षक और प्रभावशाली हो गए हैं। मूलतः ये डिज़ाइन जेंट्स् शर्टसª और जैकेट्स् के लिए बनाए गए हैं मगर इन्हें बदलकर एक-दूसरे की जगह बड़ी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। जहां तक मेरी बात है, इन्हीं डिज़ाइनों में से कई नये डिज़ाइन बना सकता हूं और इन्हें टीशर्ट्स् या लेडीज़ गारमेंट्स् में बड़ी ख़ूबसूरती से ढाल सकता हूं। इनमें से कई डिज़ाइन मैंने पुराने और बेकार कपड़ों से बनाए हैं,जैसे कि डिज़ाइन नं.118 दो ख़राब पैंटों और एक पुरानी जैकेट से बना है। आप भी ऐसी कोशिश कर सकते हैं। आपके अपने अंदर अगर कलाकारी, क्रिएटिविटी या कल्पनाशीलता है तो उसके लिए मैंने पूरी संभावना/गुंजाइश छोड़ी है। इनवर्टेड (काले में सफ़ेद) में बहुत-से डिज़ाइन हैं जिनमें जिनमें आप पेंटिंग, स्क्रीन प्रिंटिंग, पैचवर्क, कढ़ाई आदि के प्रयोग कर सकते हैं। मूल/ओरिजनल स्केच हर डिज़ाइन के साथ नीचे दिया गया है।

नई कोशिश के साथ फिर मिलेंगे। ज़ाहिर है कि इसमें बिलकुल नया काम होगा और संभावना है कि ज़्यादा काम स्त्रियों के कपड़ों के लिए होगा। थोड़ा वक़्त तो लगेगा पर उम्मीद है कि कुछ नया और अलग ही सामने आएगा।

पुरानी पीली डायरी का पहला हिस्सा आपके सामने है-

शुभकामनाओं सहित,

-संजय ग्रोवर

06/09-06-2017
Sanjay Grover/संजय ग्रोवर
इनमें से कई ग़ज़लें कई-कई बार छपीं तो कुछेक कई-कई बार चोरी भी हुईं 

( http://samwaadghar.blogspot.in/2011/06/blog-post_29.html ) । 

दिल खोलकर तारीफ़ भी की गयी तो आलोचना की तलवार भी भांजी गयी। पर न तो मैं किसीका शिष्य बन पाया न कोई मुझे अपना गुरु बना सका। अब मज़ा यह कि बीच में न तो संपादक है न कवि-मंचो, सेमिनारों में जुगाड़ भिड़ाकर घुसने की मजबूरियां। इंटरनेटीय लोकतंत्र ने लेखकों/कलाकारों को जनता/दर्शक/ऑडिएंस के बिलकुल सामने खड़ा कर दिया है। यह सीधी मुठभेड़ का वक्त है। ऐसे में मैं  अपना यह ग़ज़ल-संग्रह आपके सामने पेश कर रहा हूं। इसके आवरण भी मैंने ही बनाए हैं।


*राय जुदा-जुदा (पिछले ग़ज़ल-संग्रह पर)*


*देवताओं, अवतारों और खु.दाओं की इस ग़ैर-इन्सानी दुनिया में खुद को एक अदद आदमी बनाए रखने की इसी ज़िद ने ज़िन्दगी की बेहतरी के नये-नये रास्ते बनाए हैं ।
-नरेंद्र, युद्धरत आम आदमी, जुलाई-सितम्बर 2002

*ये तीसरी धारा की वे ग़ज़लें हैं जो न मंचीय हैं न व्यवस्था विरोध के सरल फार्मूले को अपनाती हैं ।
-ज्ञानप्रकाश विवेक (इसी पुस्तक की भूमिका में)

*आपकी ग़ज़लें कहीं-कहीं से कभी अच्छी और कभी बहुत अच्छी लगीं । इन ग़ज़लों के स्वर धीमे मगर गहरे हैं । कहन और कथ्य के मिलाप का सलीका इनका हुस्न है ।
-निदा फ़ाज़ली (शायर को लिखे एक जवाबी ख़त में)

Sanjay Grover संजय ग्रोवर
*न तो क़िताब मूर्ति है न लेखक भगवान*

बचपन से लेकर काफ़ी बाद तक कितने ही पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ा कि हमारा समाज बहुत भावुक है और पश्चिम बहुत भौतिकतावादी है। मगर व्यवहार में देखा कि हमारे यहां नये, पवित्र कहे जानेवाले, और जनम-जनम के कहे जानेवाले रिश्तों की नींव भी पैसे के आधार पर रखी जाती है, बाक़ी कोई भी रीति-रिवाज-त्यौहार लिफ़ाफ़ो के लेन-देन के बिना ज़रा-सा भी आगे नहीं सरकता।

और आगे चलकर जैसे-जैसे अपना सोचने, ख़ुदको ही डरानेवाले ख़्यालों पर ख़ुलकर विश्लेषण करने का होश और हिम्मत आते गए तो लगने लगा कि हमारी क़िताबों में लोगों ने अपनी आज़माई बातों के साथ सुनी-सुनाई और पढ़ी-पढ़ाई बातें भी अच्छी-ख़ासी मात्रा में लिख रखीं हैं। ऐसे और भी कुछ कारण रहे कि क़िताबों में पहले जैसी रुचि नहीं रह गई।

क़िताबों के प्रति भगवान-भक्त जैसी आस्था और श्रद्धा पैदा करने की कोशिशें अब ज़रा नहीं सुहातीं। क़िताब को लगभग मूर्ति, लेखक को लगभग भगवान बनाने और बिक्री को चढ़ौती की तरह हासिल करने की मानसिकता अजीब लगती है। क़िताबें ज़रुरी हैं, उपयोगी हैं, मगर लेखक कोई पवित्रता (?) की लाँड्री में से निकला मसीहा नहीं है कि उसके लिखे को पढ़ने के बजाय चरनामृत की तरह खोपड़े पर उड़ेलकर यह सोचा जाए कि इसमें से जो निकलेगा सब अंदर घुसकर अपने-आप कोई रास्ता बनाएगा और हमारे दिल-दिमाग़ को सिर्फ़ सच्चाई की ओर ही ले जाएगा। जैसा मैंने समाज को देखा है, मुझे तो बिलकुल भी नहीं लगता कि लेखक सिर्फ़ सच ही लिखता है। लेकिन हम अगर हिंदू-मुस्लिम या वाम-दक्षिण जैसे खानों में बंटे हो तो हमारे झूठ और सच को समझने के पैमाने पूर्वाग्रही हो ही जाते हैं।

अगर समाज की जड़ों तक पाखंड पसरा हो तो पाठक भी झूठ को सच की तरह ही पढ़ता है। जो लेखक शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाई जानेवाली क़िताबों में शामिल होने के लिए सर के बल हो जाते हैं उनके द्वारा लिखे गए स्वाभिमान के निबंध में कितना दम और कितनी सच्चाई हो सकती है !?

तुलसीदास और मनुमहाराज के महाग्रंथ किसीके लिए छाती से लगाए रखने के क़ाबिल हैं तो दूसरे कई लोगों के लिए क़ाबिले-बर्दाश्त भी नहीं हैं।

क़िताबों के प्रति जागरुकता पैदा करनी चाहिए, श्रद्धा, आस्था और अंधभक्ति नहीं।

-संजय ग्रोवर

03-09-2014

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Sanjay Grover संजय ग्रोवर
नास्तिकता का अपना यह सफ़र बहुत दिलचस्प रहा।

सामुदायिक ब्लॉग ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर पहली पोस्ट लिखी-‘नास्तिकता सहज है’।

http://nastikonblog.blogspot.in/2010/04/blog-post_24.html

अच्छी बहस चली। दो-एक पोस्ट और लिखीं। आखि़री पोस्ट पर ज़बरदस्त बहस छिड़ गई, इतनी कि प्रतिपक्ष के लोग मेरे पीछे-पीछे फ़ेसबुक पर चले आए और बताने लगे कि नास्तिक होने या बने रहने के क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं। उसी दिन मैंने फ़ेसबुक पर ‘नास्तिकThe Atheist’  नाम से ग्रुप बना दिया। इसमें बारह-तेरह लोग थे जिनमें से संभवतः कुछ वामपंथी और कुछ बसपाई मित्र थे। एक नया काम यह किया कि दूसरों की तरह हमने अपनी तरफ़ से किसीको ‘ऐड’ नहीं किया बल्कि जो लोग ख़ुद रिक्वेस्ट करते थे उन्हीं मे से कुछ को/सबको ले लेते थे।

एक काम यह किया कि हमने अपनी पोस्टों/विचारों या तर्कों को आस्तिकता के उन्हीं तर्कों तक सीमित रखा जो हमारे आस्तिक मित्र रोज़मर्रा के जीवन में इस्तेमाल करते हैं। अणु-परमाणु की बहसों की हमने तथाकथित ईश्वर के संदर्भ में क़तई परवाह नहीं की। छोटी से छोटी बात पर तर्क रखे, बहस की। नये से नये तर्क जो पहले कभी रखे नहीं गए थे। साल-भर के अंदर ग्रुप के बाहर भी नास्तिकता पर काफ़ी स्टेटस दिखाई देने लगे। सबसे मज़ेदार बात यह हुई कि जो लोग नास्तिकता का नाम भी लेने में हिचकिचाते थे, वे ख़ुदको असली नास्तिक और हमें नक़ली नास्तिक बताने लगे। मिलते-जुलते नामों से ग्रुप खुलने लगे। ख़ुद मैंने भी एक ब्लॉग ‘नास्तिकThe Atheist’ नाम से बना डाला।

http://nastiktheatheist.blogspot.in/

ग्रुप भी फ़ेसबुक पर चल ही रहा है और मैं ज़्यादा लफ़्फ़ाज़ी करके आपको बोर नहीं करना चाहता ; इस व्यंग्य-संग्रह को पढ़कर बाक़ी अंदाज़ा आप ख़ुद ही लगा लेंगे।

अगर आप नास्तिक नहीं हैं तो इस संग्रह को इसलिए पढ़ सकते हैं कि पढ़कर हमारी धज्जियां उड़ा सकें, हमें शर्मिंदा कर सकें, हमें सोचने पर मजबूर कर सकें।

( नास्तिकता पर अगली क़िताब जल्दी ही.... )

-संजय ग्रोवर

10-07-2015

यहां, मित्रों/पाठकों की प्रतिक्रियाओं के जवाब देने के लिए उचित जगह फ़िलहाल दिखाई नहीं दे रही, इसलिये यहीं जवाब दिए दे रहा हूं-

शोभाराम वर्मा जी, ये सब बक़वास क्यों है, कारणों के साथ बताते तो मैं ज़रुर जवाब देने की कोशिश करता।

सोनम चौधरी जी, अगर भगवान निराश व्यक्तियों के काम आता है तो वह उन्हें निराश बनाता ही क्यों है ? भगवान क्या कोई छंटा हुआ राजनेता है कि पहले लोगों को निराश करता है, उनके काम बिगाड़ता है फिर ख़ुद ही उनका काम सुधारने के नाम पर अपनी इमेज बनाने चला आता है ? अंततः ग़रीब और निराश लोगों को मिलता क्या है भगवान से ? अगर भगवान निराशों और ग़रीबों के इतना क़रीब है तो भगवान को पाने के लिए सभी अमीर और आशावादी भक्त ग़रीब और निराश क्यों नहीं हो जाते ? आप कब ग़रीब हो रहीं हैं ?

साहिल चौहान जी, किसी काल्पनिक चीज़ पर विश्वास करना और किसी वास्तविक चीज़ पर विश्वास करना दो अलग-अलग बातें हैं।

Dear Sahil, I am not that kind of atheist. You must understand the difference between believing a hypothetical thing and believing in a genuine thing.

-संजय ग्रोवर

06-08-2017


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