इन व्याख्यानों का उद्देश्य यह है कि हम वेदान्त के सिद्धान्तों को भली-भाँति समझ सकें, जिससे वह हमारे दैनन्दिन जीवन में घुल-मिल जाएँ; जन सामान्य को यह सिखलाना कि इन सिद्धान्तों को किस तरह हम व्यवहार में ला सकते हैं और प्रत्येक क्षण अपने अस्तित्व के साथ हम इन्हें लेकर जी सकते हैं। जब हम इन विचारों को हमारे भीतर आत्मसात् कर लेंगे, तभी उनका पोषण होगा और वे हमारी आध्यात्मिकता को दृढ़ बनाएँगे।, उसी तरह जैसे भोजन करने से हमारा शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है। वेदान्त बहुत ही व्यावहारिक सिद्धान्त है, और इन पाँचों व्याख्यानों को कुछ इस तरह सजाया गया है कि पाठक इन सत्यों को अपने जीवन में उतार सकेंगे जिसे वक्ता ने समझकर उनके समक्ष रखे हैं। लेखक ने इन वेदान्त के विचारों को अनुरोध करने के कारण ही मुक्तहस्त प्रदान किये थे। उन्होंने इन विचारों को इस आशा से दिये थे कि इनके द्वारा कतिपय लोगों का कल्याण तो अवश्य ही होगा।”