हिन्दी अनुवाद है।
इस पुस्तक के लेखक स्वामी परमानन्द स्वामी विवेकानन्दजी के शिष्य थे। विदेश में रहकर उन्होंने अनेक साधकों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन करने हेतु अनेक पत्र लिखे थे। प्रस्तुत पुस्तक उन्हीं पत्रों का सारसंकलन है। मन-वचन की पवित्रता ही आध्यात्मिक जीवन का सार है। इस पुस्तक के प्राक्कथन में भगिनी देवमाता ने इसी को उजागर किया है।