विधवा – बहता काजल: A Hindi Poem

Satyendra Pandey
119

 विधवाबहता काजल , एक ऐसे दर्द की अभिव्यक्ति है,जिसे शब्दों में बाँध पाना सहज नहीं है l एक विधवा की दर्द भरी भावनाओं की दुनिया इस भौतिक दुनिया से बिलकुल परे है l खुद की मनोस्थिति , पारिवारिक दशा , वा समाज से उसका संघर्ष अत्यंत ही चुनौती पूर्ण है l इन चंद पंक्तियों में मैंने उसकी भावनाओं , चुनौतियों एवं समाज से उसके अच्छे जीवन हेतु निवेदन का एक छोटा सा प्रयास किया है l कोई किसी का दुःख ले नहीं सकता है, लेकिन बांटने से कम जरूर होता है l आप मेरी लिखी हुई इन पंक्तियों को दिल से पढ़िए और उस वेदना को महसूस कीजिए l

धन्यवाद

Read more

About the author

 विधवा – बहता काजल  is a Hindi poem written by Vikram Pandey. It's more than just a poem. Hopefully you will like it. He also wrote one of the popular Hindi poem मन जानता है. More books will be coming soon. 

You can find the book मन जानता है on Google play at below link: 

https://play.google.com/store/books/details/Vikram_Pandey_%E0%A4%AE%E0%A4%A8_%E0%A4%9C_%E0%A4%A8%E0%A4%A4_%E0%A4%B9_A_Hindi_Poem?id=gOFfCgAAQBAJ

Don't forget to give you feedback. 

Read more
4.4
119 total
Loading...

Additional Information

Publisher
Satyendra Pandey
Read more
Pages
37
Read more
Read more
Best For
Read more
Language
Hindi
Read more
Genres
Foreign Language Study / Hindi
Poetry / Asian / General
Poetry / General
Poetry / Subjects & Themes / Death, Grief, Loss
Poetry / Subjects & Themes / Family
Poetry / Subjects & Themes / General
Read more
Content Protection
This content is DRM protected.
Read more

Reading information

Smartphones and Tablets

Install the Google Play Books app for Android and iPad/iPhone. It syncs automatically with your account and allows you to read online or offline wherever you are.

Laptops and Computers

You can read books purchased on Google Play using your computer's web browser.

eReaders and other devices

To read on e-ink devices like the Sony eReader or Barnes & Noble Nook, you'll need to download a file and transfer it to your device. Please follow the detailed Help center instructions to transfer the files to supported eReaders.
 बिहार के बच्चों में और बिहार के युवाओं में आत्म-स्वाभिमान की पुष्टि और आत्म-सम्मान के प्रगल्भन के लिए इन गीतों का अरविन्द पाण्डेय द्वारा सृजन वर्ष 2003 में तब किया गया था जब बिहार के प्रति सम्पूर्ण देश में एक नकारात्मक भाव का विस्तार कुछ शक्तियों  द्वारा आशय-पूर्वक किया जा रहा था.                         इन गीतों के सृजन के बाद इनकी गेयता को  अक्षुण्ण रखने और उसे व्यवस्थित रूप देने हेतु इनकी रिकार्डिंग कराई गयी और वीनस म्युज़िक कंपनी ने इन गीतों का कैसेट्स और सी.डी. भी वर्ष 2003 में प्रस्तुत किया था.

                 वीनस द्वारा रिकार्ड कराए गए ये गीत संगीतबद्ध रूप में सम्प्रति Youtube  पर उपलब्ध हैं.


Poetry comic attempt to bring forth the plight, struggle of theatre artists in India.

जब समाज के एक बड़े तबके का ध्यान गरीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी और जीवन के लिए ज़रूरी बातों पर लगा होता है तो कला जगत को अपने रचनाओ के लिए कई मुद्दे मिलते हैं लेकिन उसी कला जगत को खाने के लाले भी पड़ जाते हैं। ज़िन्दगी के लिए की ज़रूरी चीज़ें जुटाने को घिसटता समाज कला को सिर के बालों की तरह मान लेता है। बालो के बिना भी जीवन चल सकता है तो ऐसे परिवेश में कलाकार सिर के बालों की तरह उड़ जाते हैं, जबकि कला तो समाज की आत्मा, हृदय सी होती है। आत्मा बिना एक रोबोट सा जीना भी क्या जीना? भारतीय नाट्य, थिएटर कलाकारों को ऐसे माहौल में अपनी प्रतिभा, कला को संजो कर गुज़ारा करना पड़ता है। जहाँ संसाधनों की बर्बादी की इतनी ख़बरें आती हैं तो लगता है कि अगर उस अपव्यय में से थोड़ी सी कद्र ऐसे कलाकारों को मिल जाए तो कितने जीवन सफल हो जाएं। एक काव्यांजलि सभी सच्चे अदाकारो-कलाकारों के नाम!

©2018 GoogleSite Terms of ServicePrivacyDevelopersArtistsAbout Google|Location: United StatesLanguage: English (United States)
By purchasing this item, you are transacting with Google Payments and agreeing to the Google Payments Terms of Service and Privacy Notice.