Parchhaiyon Ke Peechhe: Poorvsandhya: Kuch Prem-Kahaniyan (4th Part)

· The Digital Idiots
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About this ebook

ॐ नमः शिवाय!                 श्री हरि!

 

नमस्कार दोस्तों! फिर आपके समक्ष प्रस्तुत हूँ, इस बार अपने उपन्यास शृंखला, ‘परछाईयों के पीछे’ का चौथा भाग, ‘पूर्वसंध्या’ लेकर। जीवन में सबसे सरल काम है, पीछे मुड़कर देखना, और सबसे मुश्किल काम है, पीछे जो गुजर गया, उसे जीना! लेखक की मजबूरी है कि वो जिएगा नहीं तो लिखेगा कैसे? ऐसे कठिन कार्य को करके मैं डेढ़ बरस में फिर एक भाग लेकर आ पाया हूँ। कहानी भी जीवों की तरह जन्म लेती है, बचपन और लड़कपन से गुजरती है, जवान होती है, फिर प्रौढ़ हो जाती है और फिर एक समय खत्म हो जाती है। यही कहानी का जीवन-चक्र होता है, लाईफ साईकिल होती है। रोलर-कोस्टर वाली कहानियाँ अप्राकृतिक होती हैं, इनके लिए चुट्कुले बनते हैं जैसे कि एक बुड्ढा बचपन में ही मर गया। तो लीजिये कहानी का प्रौढ़ रूप सामने है, अगला भाग अंतिम भाग होगा इसलिए सभी पात्र जल्दी-जल्दी अपनी नियति भोगने में लगे हैं। धीरे-धीरे सारी प्रेमकहानियाँ अंगड़ाई लेकर उठ बैठी हैं। अब इस कहानी को चरम देने की शक्ति मैं ईश्वर से माँगता हूँ और आप इस कहानी को पढ़कर कहानी के अंत के लिए खुद को तैयार कीजिये। मेरी इस पुस्तक को भी भरपूर प्यार दीजिएगा!

Ratings and reviews

3.3
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mohit saini
August 18, 2024
end is not good

About the author

हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।

लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।

ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।

कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।

ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।

कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!

विभिन्न सोशल मीडिया साईट्स और लेखन साईट्स पर भी उपलब्ध हूँ। मुझसे जुड़िये और साहित्य के जरिये भाषा, समाज, राष्ट्र और धर्म की सेवा मे मेरे इस यज्ञ को समर्थन दीजिये।

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