मेरी अठ्ठाइसवीं किताब, उपन्यास शृंखला ‘आधी-अधूरी साधनाएं’ का पहला भाग 'प्रारंभ' आप लोगों के समक्ष आ गया है। इसके साथ ही मैं इसका दूसरा भाग, इति भी निकाल रहा हूँ। ये दो भागों का ही उपन्यास है। एक साथ ही लिखना खत्म किया तो अब बेजा देर करने की कोई जरूरत नहीं है। असल में जब किसी उपन्यास को भागों में बांटा जाता है तो इसके पीछे भी लेखक की कुछ मंशा होती है। असल में कई कहानियाँ ऐसी होती हैं जिसमें धरातल पर स्पष्ट बदलाव देखे जा सकते हैं। इसलिए ऐसी कहानियों को तदनुसार भागों में बांटना लेखक के लिए भी शुभकारी होता है और पाठकों के दिमाग को भी एक ठहराव मिलता है। हम सभी ज़िंदगी में कुछ साधनाएं करते हैं। कुछ पूर्ण होती हैं, कुछ अपूर्ण रह जाती हैं! ऐसी ही कुछ साधनाएं इस उपन्यास में लिखी गयी हैं। ये बिलकुल आपकी जानी-पहचानी दुनिया होगी जिससे मैं एक कहानी उठा लाया हूँ। आपको अच्छी लगे तो जरूर प्यार दें। दूसरा भाग भी साथ है, सो आपके लिए वो इंतजार भी जरूरी नहीं जो आप ‘परछाइयों के पीछे’ उपन्यास के लिए कर रहे हैं।हर्ष रंजन एप्प पर फ्री पढ़ें।
लेखन के इन दो दशकों में, बीसियों जिल्दों के साथ मैं आज भी बरस दर बरस कभी टूटता, कभी खुद को जोड़कर खड़ा होता रहा। मुझे सिर्फ इतना भान रहा कि संभवतः किसी दैव-प्रयोजन के लिए मैं धारावाहिक बनकर जारी रहा! खुद की रसद जुटाकर, खुद से सीखकर, खुद से वैर रखके व खुद पर रीझकर मैं सिर्फ एक ध्रुव तारे को देखकर इस अंधेरी रात दिशा-ज्ञान पा रहा हूँ कि हर बसंत से पतझड़, फलकर फिर नए फल के लिए खुद को उजाड़ता जा रहा हूँ।
आगे बढ़ने के लिए, साध्य-समय-शक्ति-साधन-सुरक्षा-