राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रस्ताव: १९५० -२००७

Suruchi Prakashan
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प्रति वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा आयोजित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (ABPS) एवं कार्यकारी मंडल (KKM) द्वारा देश के समसामयिक समस्याओं पर मंथन- चिंतन किया जाता हैI इन सभाओं में पारित प्रस्तावों द्वारा जटिल समस्याओं पर सरल निदान प्रस्तुत किए जाते हैं जो सर्वथा राष्ट्रहित में होते हैंI सन् 1950 से 2007 के मध्य रखे गये  विभिन प्रस्तावों का संकलन इस पुस्तक में निहित हैI कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण प्रस्ताव इस प्रकार हैं - देश-विभाजन के दुष्परिणाम और हमारा कर्तव्य, गौहत्या, कश्मीर समस्या, नेहरू - चाऊ एन लाई वार्ता, भाषा-नीति, चीन तथा पाक आक्रमण, बांग्लादेशी घुसपैठ, सामाजिक समरसता एवं धर्म निरपेक्षता (Secularism) I   

विभिन प्रस्तावों के विषय जन-सामान्य के जीवन पर पड़ने वाले दूरगामी परिणामों को उजागर कर एक सक्षम, सबल व सशक्त राष्ट्र के निर्माण की भूमिका व आधार रखते हैंI इस दृष्टि से यह पुस्तक संघ की गतिविधियों एवं इसके कर्मभाव व उद्देश्य को प्रतिबिंबित करती हैI

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Additional Information

Publisher
Suruchi Prakashan
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Published on
Oct 1, 2007
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Pages
403
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ISBN
9788189622299
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Best For
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Language
Hindi
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Genres
Political Science / Political Process / Political Parties
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 संविधान(101 वां संशोधन ) अधिनियम, 2016 को इस संस्करण में स्थान दिया गया है| इस अधिनियम को राष्ट्रपति की अनुमति सितंबर 2016 में प्राप्त हुई| इसके परिणामस्वरूप माल और सेवा कर लागू करने के लिए तैयारी हो रही है| इस पुस्तक के उक्त कर के विषय में पर्याप्त जानकारी दी गयी है| उच्तम नयायालय ने संविधान के 99वें संशोधन और राष्ट्रीय न्‍यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को असांविधानिक घोषित कर दिया| यह नियम इस संस्करण में है| यही नहीं न्यायमर्ति चलमेश्वर के विस्मत निर्णय के साथ लेखक ने इस निर्णय के बारे मे अपनी टिप्पणी दी है| यह विचारोत्तेजक और शिक्षाप्रद है|

उच्तम नयायालय के सितंबर 2016 तक के सभी महत्वपूर्ण निर्णयों को यथास्तान उद्दरित किया गया है|

यह पुस्तक LLB और LLM के विद्धयार्थीयों के लिए पाठ्या पुस्तको में शीर्ष स्थान पर है| यह पुस्तक विशेष रूप से इस प्रकार रची गई है की वह न्यायिक सेवा और सिविल सेवाओं के अभ्यर्थीयों के लिए अधिकाधिक उपयोगी हो सके|

भारत के विभिन्न विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तार स्तर व राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं, यथा -UPSC, PCS तथा UGC NET की आवश्यकताओ को ध्यान में रखकर इस पुस्तक की रचना एक स्तरीय पाठ्य-पुस्तक के रूप में की गयी है। This book is recommended in Nalanda Civil Services Centre, Patna university, Coaching Institute, Bihar and Jharkhand. पुस्तक में प्रमुख विद्वानों के विचारों को क्रमश: प्रस्तुत किया गया है। समाजशास्त्राीय अवधारणाओं का प्रामाणिक अनुवाद और उनके विशलेषण के साथ-साथ पाशचात्य विद्वानों के नामों का सही उच्चारण इस पुस्तक की विशेषताए हैं| अंग्रेजी माछयम से अछययन करने वाले पाठकों की अपेक्षा हिन्दी माछयम से पठन-पाठन करने वाले पाठक ज्ञान की द्रष्टि से पीछे न रहें, इस बात का छयान रखा गया है। अंग्रेजी की नवीनतम उच्च स्तरीय पुस्तकों को आधार मानकर विभिन्न प्रकार के समाजशास्त्राय तथ्यों को एकत्रिात कर मौलिक विशलेषण करने का प्रयास किया गया है। तृतीय संस्करण की विछोषताएं • इस संस्करण में १० नये अधयाय और जोड़े गये हैं तथा विगत् संस्करण के सभी अधयायों में आवशयकतानुसार परिवर्धन किया गया है। • यथास्थान नवीन संदर्भों वेफ संवर्धन से पुस्तक का प्रत्येक अधयाय बहुत समृद्ध हुआ है। • विषय से सम्बंधित समस्त प्रामाणिक तथ्यों का संकलन पुस्तक में एक ही जगह पर पर उपलब्ध है। • पाठकों की सुविधा हेतु अनेक उद्धरण और लेखकों के नाम साथ वर्ष तथा अंक दिये गये हैं, जो क्रमश: पुस्तक का प्रकाशन वर्ष और पृष्ठ संख्या दर्शाते हैं। इस तरह के विवरण स्तरीय अनुसन्छाानों के प्रकाशनों में ही मिलते हैं।


संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में यह कथन था कि संयुक्त राष्ट्र के लोग यह विश्वास करते हैं कि कुछ ऐसे मानवाधिकार हैं जो कभी छीने नहीं जा सकते, मानव की गरिमा है और स्त्री-पुरुष के समान अधिकार हैं | इस घोषणा के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 दिसम्बर 1948 को मानव अधिकार की सार्वभौम घोषणा अंगीकार की |

इस घोषणा से राष्ट्रों को प्रेरणा और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ और वे इन अधिकारों को अपने संविधान या अधिनियमों के द्वारा मान्यता देने और क्रियान्वित करने के लिए अग्रसर हुए | राज्यों ने उन्हें अपनी विधि में प्रवर्तनीय अधिकार का दर्जा दिया |

इस पुस्तक में घोषणा के पाठ के साथ-साथ लेखक ने टिप्पणियां देकर अधिकारों के विस्तार को बताया है |

भारत ने जब अपना संविधान बनाया तब इस घोषणा को हुए बहुत थोड़ा समय हुआ था | किंतु हमने अपने संविधान में इस घोषणा में समाहित अधिकारों को स्थान दिया | आगे चलकर कुछ अधिकार अधिनियमों में समाहित किए गए, कुछ न्यायालयों के निर्णय के द्वारा आए |

इस पुस्तक में संविधान के सुसंगत अनुच्छेदों और अधिनियमों की धाराओं के प्रति निर्देश है | उन सब निर्णयों का भी उल्लेख है जिनके द्वारा मानवाधिकार लागू किए गए हैं |

यह एकमात्र ऐसी पुस्तक है जिसमें घोषणा के अनुच्छेदों के समानांतर भारतीय विधि के उपबंध दिए गए हैं |

लेखक की पुस्तक मानव अधिकार प्रसंविदाएँ और भारतीय विधि इस पुस्तक की पूरक है | दोनों को पढ़कर मानवाधिकार के विषय में पूर्ण जानकारी मिलती है |

यह पुस्तक उन विधार्थियों के लिए अत्यंत लाभदायी है जो राजनीतिशास्त्र, विधि या अन्य विषय के भाग के रूप में मानवाधिकार का अध्ययन कर रहे हैं |

यह उनके लिए विशेष सहायक है जो विभिन्न लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा या न्यायिक सेवा की परीक्षा में सफल होने की कामना रखते हैं |
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