Neeli Nasen Aur Saudaamini

· Harsh Ranjan Jointly With Authors Ink Publication
5.0
3 reviews
Ebook
145
Pages

About this ebook

ॐ नमः शिवाय!

हर्ष रंजन की ओर से आप सब को प्रणाम!

खटो! जब तक जर्जर न हो जाओ के सिद्धान्त का पालन करते हुए अपनी बीसवीं कृति और आठ नंबर कविता संग्रह लोकार्पित करता हूँ। पिछले संग्रह की तरह इसे भी खूब सराहें और प्यार दें! ये सारी पंक्तियाँ आपसे सोशल मीडिया के अनेक मंचों से मिलने की कोशिश कर चुकी है। संग्रह की गरिमा के साथ ये अब आपके हाथों में है! ये कवितायें बड़ी कठिन समय में लिखी गयी हैं और मैं मानता हूँ कि एक दौर की सबसे तीक्ष्ण अनुभूतियों वाली पंक्तियाँ हैं। जब आप स्वयं को एक व्यक्ति न देखकर, एक और उदाहरण देखते हैं तो इसके साथ ही आप अकेले नहीं रह जाते और आप अगर कुछ करते हैं, तो आप अकेले के लिए नहीं करते बल्कि पूरे समाज के लिए करते हैं। आपका दुख, आपका सुख, आपकी वेदना, आपकी अनुभूतियाँ सभी का साधारणीकरण हो जाता है। कविता संग्रह को अनुभव कीजिये, इसी संग्रह की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ:

खटो!

जब तक

जर्जर न हो जाओ!

चाहो!

जब तक भावनाओं से

बंजर न हो जाओ!

जूझो!

जब तक नाकामी से

नाउम्मीद हो मर न जाओ!

हमें प्लान बी

बस इतना ही बताया है

बुजुर्गों ने कि

जिंदगी, मौत की बस्ती में

जवान एक लड़की अकेली है,

मौत के घर की लड़कियां

उसकी आदतन/मजबूरन/शौकिया

बड़ी गाढ़ी सहेली हैं,

तुम्हें मालूम हो उसकी अवस्था कि

सर्दी की अंधेरी रात, इन गालियों में,

वो उघरे बदन निरा अकेली है!

लेकिन…

…हाँ! हमने भी पाया है कि

उसकी रूह तक ने आजतक

सैकड़ों सौदामिनियाँ झेली हैं!

उसकी नस-नाड़ियां कुछ यूँ हठीली हैं!

Ratings and reviews

5.0
3 reviews
Yogendra
February 17, 2025
nervous

About the author

नमस्कार,

मैं हर्ष रंजन अपनी रचनाओं के संसार में आपका स्वागत करता हूँ। मेरी कलम मेरे लिए मेरी आवाज, मेरे सपने, मेरी सच्चाई, मेरी गलतियां, मेरा हथियार और मेरे लिए दुनिया की सबसे पहली टाइम मशीन है। इन वाक्यों में मैं की जगह आप होंगे अगर आप इन किताबों के साथ कुछ कदम एक साथ चलने के लिए तैयार हैं। मेरी किताब न तो सर्कस है, न तो आपका ध्यान और आपके यत्न खींचने के लिए कोई व्यूह, न तो ये सत्संग हैं। ये एक बसा हुआ शहर है जहाँ हर एक अनुच्छेद एक गली है और हर शब्द एक मकान। हर एक कविता, हर कहानी अपने आप में एक संसार है।

मैं आपको दिल की एक बात बताना चाहूंगा। मैंने हिंदी को उसकी शुरुआत और हिंदी के साहित्य को उसकी शुरुआत से जाना है। ये सफर बहुत रोचक है। कई प्रतिभा आयी और हिंदी को कुछ कदम और आगे बढ़ा गईं। मैंने अपने शब्दों का, अपनी शैली का आविष्कार नहीं किया, मैंने एक परंपरा को एक अनुज की तरह आगे बढ़ाया है। साहित्य के वर्णित विषय और साहित्य की शैली पुरानी हो सकती है पर समय का चक्र उन्हें फिर से उभार लाता है।

किताबें पढ़ें और अपने विचार जरूर बताएं।

आभार

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