थोड़ा लंबा इंतजार हो गया दोस्तों। असल में लेखक के रूप में मैं खुद कहानियों के जंगल में भटक जाता हूँ, थोड़ा वक़्त किसी कहानी का पीछा करता हूँ, थोड़ा वक़्त कहीं और गुजार लेता हूँ। मैं परछाइयों के पीछे शीर्षक महाउपन्यास के तीसरे कदम पर आपका स्वागत करता हूँ।
थोड़ी क्षमा चाहिए कि पिछला भाग, ‘विस्तार’ निकालते हुए ये कहा था कि तीसरा भाग, ‘पूर्वसंध्या’ होगा पर जैसा कि पहले भी कह चुका हूँ कि ये उपन्यास मेरे दिमाग में सागर से महासागर बन बैठा है। जब कहानी लिखने बैठा तो लगा कि काफी कुछ और कहना पड़ेगा तभी जाकर कहानी के साथ न्याय हो पाएगा। ये तीसरा भाग, एक ठहराव है, एक पड़ाव है कहानी का, और इस भाग को मैंने भी पड़ाव ही कहा है।
काफी कुछ होने के बाद कहानी यहाँ नयी उड़ान के पहले कुछ पल रुकती है। हम सब अनुभव कर सकते हैं कि घटनाएँ पात्रों को भी काफी कुछ सोचने का मौका दे रही हैं और नयी घटनाओं की पृष्ठभूमि तैयार कर रही हैं। कई दुर्घटनाओं के बीच अभी भी सब कुछ शुभ ही बना हुआ है मानो दांतों के बीच जिह्वा जी जा रही हो अपनी ज़िंदगी। अगले भाग का इंतजार कीजिये, वचन देता हूँ कि जल्दी ही सामने आऊँगा फिर। तब तक के लिए ये छब्बीसवी किताब का आनंद लीजिये और प्यार भेजिये। हर्ष रंजन एप्प पर फ्री पढ़ें।
हर्ष रंजन
लेखन के इन दो दशकों में, बीसियों जिल्दों के साथ मैं आज भी बरस दर बरस कभी टूटता, कभी खुद को जोड़कर खड़ा होता रहा। मुझे सिर्फ इतना भान रहा कि संभवतः किसी दैव-प्रयोजन के लिए मैं धारावाहिक बनकर जारी रहा! खुद की रसद जुटाकर, खुद से सीखकर, खुद से वैर रखके व खुद पर रीझकर मैं सिर्फ एक ध्रुव तारे को देखकर इस अंधेरी रात दिशा-ज्ञान पा रहा हूँ कि हर बसंत से पतझड़, फलकर फिर नए फल के लिए खुद को उजाड़ता जा रहा हूँ।
आगे बढ़ने के लिए, साध्य-समय-शक्ति-साधन-सुरक्षा-
आगे बढ़ता रहूं इसके लिए प्रोत्साहन बनाये रखिये।
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