विवेक जीवन

Suruchi Prakashan
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 Swami Vivekananda, known in his pre-monastic life as
Narendranath Datta. He was intelligent since birth. He excelled in music,
gymnastic and studies. He was modern in his approach in understanding of
religion, view of man, principles of morality and ethics. He harmonized the
East and the West, religion and science. He was the follower of Swami
Ramakrishna Paramanth. the author Dr. Sushil gupta describes the life of Swami
ji in efficient manner. His teachings are motivational and following them can
lead us to live properous life.  

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4.5
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Additional Information

Publisher
Suruchi Prakashan
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Published on
Jun 1, 2013
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Pages
74
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ISBN
9789381500101
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Best For
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Language
Hindi
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Genres
Philosophy / General
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संघ संस्थापक प॰पू॰ डॉ॰ हेडगेवार जी के देहावसान के पश्चात् 1940 में पूजनीय माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (श्री गुरूजी) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक बनेI प्रतिभासम्पन्न व्यक्तित्व, तेजस्वी व ऋषितुल्य  जीवन, निर्भय, अडिग, कुशल नेतृत्व, दूर-दृष्टि, सादगी, परिश्रम, आत्मीयता व संवेदनशीलता - श्रीगुरुजी इन गुणों से ओतप्रोत थेI लाखों स्वयंसेवकों के ह्रदय पर श्रीगुरुजी के स्नेही व प्रेरणादायक व्यक्तित्व ने अनूठी छाप छोड़ीI

विभिन्न विषयों पर श्रीगुरूजी की  सटीक व संतुलित दृष्टि थीI लगभग एक दशक पूर्व उनके विचारों, लेखों, भाषणों तथा संस्मरणों का संग्रह ‘श्रीगुरुजी समग्र ’ 12 खण्डों में प्रकाशित हुआI समग्र दर्शन में विभिन्न समसामयिक तथा राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर उनके विचार समाहित हैंI समय समय पर उठने वाले प्रश्नों तथा समस्याओं का समाधान भी इस समग्र का विषय हैI ‘श्रीगुरुजी समग्र ’ का संक्षिप्त दर्शन है - ‘श्रीगुरुजी - दृष्टि और दर्शन’  

प्रिय पाठक,

कहते हैं की ‘ज्ञान जितना बांटो उतना बढ़ता है’ अतः जिंदगी में जो भी सुना, समझा और अनुभव किया उसे दूसरों के संग बांटने से अत्यंत ख़ुशी और संतोष प्राप्त होता है| एक ‘अध्यात्मवादी’ के रूप में पिछले २५ वर्षो के तपस्वी जीवन में मैंने कई सारे विशिष्ट अनुभव किये जिन्हें शब्दों का रूप देकर आप सभी पाठकों के समक्ष रखने जा रहा हूँ | अध्यात्मिक पथ पर चलते चलते मैंने लगातार खुद का विश्लेषण कर अपने आप को पुन: खोजने का प्रयास किया हैं | एक स्तंभ-लेखक के तौर पर मैंने सदैव यही कोशिश की है की मै अपने पाठको के समक्ष वही बातें पेश करूँ जिन्हें मैंने स्वयं अनुभव किया हैं | मेरे अनुभव की इस सुंदर यात्रा को सुखद बनाने के लिए मैं सर्व प्रथम ‘परमपिता परमात्मा’ का आभार मानता हूँ और साथ साथ ब्रह्माकुमारिज़ संस्था की पूर्व मुख्य प्रशाशिका दादी प्रकाशमणि जी,दादी हृदयमोहिनी जी,दीदी नलिनी जी, दादा करुणा जी एवं वे सब ज्ञानी-गुणीजनो का भी शुक्रगुज़ार हूँ जिन्होंने मुझे अध्यात्मिक प्रज्ञा से नवाज़ा और इस लायक बनाया जो मैं आज अच्छा सोच व् लिख सकूँ, | अंतमे मैं विश्वभर के, उसमे भी खास भारत के विभिन्न अखबारों के संपादकों और उनके सहकारियों को धन्यवाद करता हूँ की जिन्होंने पिछले ६ साल में मेरे द्वारा लिखे गये ३००० से भी अधिक लेख अपने अपने प्रकाशनों द्वारा प्रकट करके आप सभी पाठकों के ज्ञान में वृद्धि की | मुझे आशा व् विश्वाश हैं की ‘गूगल’ के इस सुप्रयास के द्वारा मैं आप सभी को कुछ नवीनतम ज्ञान व् अनुभवों से लाभान्वित कर सकूँगा |ओम शांति |

मानवता की सेवा में सदैव

राजयोगी निकुंज                   
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