नमस्कार! मैं हर्ष रंजन, अपने नए निबंध संग्रह की दहलीज पर आपका स्वागत करता हूँ। लीजिये, बत्तीसवीं पुस्तक आपके सामने है, और ये भी एक निबंध सीरीज के रूप में। ये पहला भाग, तीसरी दुनिया के चर्चे का, दो ख्वाब के रूप में उतारा गया है। यहाँ मैंने दो ऐसे खवाबों की चर्चा की है, जो हमें दिन में बीस-तीस बार कानों के रास्ते मिलते होंगे। तीसरी दुनिया के चर्चे, ये नाम इसलिए मैंने रखा कि जिन मुद्दों की चर्चा मुझे करनी है वो सब तीसरी दुनिया के ही हैं, पहली दुनिया तो परिणामोन्मुख कार्य करती है, उसे प्रोसैस में पड़ने की जरूरत नहीं है। दूसरी दुनिया अभी रिजल्ट और प्रोसैस की समझ से परे हैं। प्रोसैस को लंबा करना और रिजल्ट से ज्यादा प्रोसैस पर सोचना तीसरी दुनिया का ही काम है। दुनिया में कभी-कभी कुछ ऐसी युति बन जाती है जो जुबान पर चढ़ जाती है।
आपने राम और रावण सुना होगा, कृष्ण और कंस सुना होगा, पांडव और कौरव सुना होगा, इसी तरह आग और पानी सुना होगा, थोड़ा और बहुत सुना होगा, ऊंचा और नीचा सुना होगा, उठना और बैठना सुना होगा, नाना और दादा सुना होगा, कुछ ऐसे ही धर्मों के नाम भी हैं, जो मैं लूँगा नहीं। इसी तरह एक बड़ा कामयाब जोड़ा है, स्वतंत्रता और समानता का। दोनों एक-दूसरे के बड़े घातक दुश्मन हैं और विचारक बहुत पहले ही, इनके अर्थों में मौलिक विरोधाभास देख चुके थे पर आज दोनों एक-दूसरे के पूरक बना दिये गए हैं। कभी भी दोनों तरह के लोगों को, दोनों चीजें, एक साथ नहीं चाहिए होती हैं। अगर किसी एक के पास स्वतन्त्रता है तो उसे दूसरे की उससे समानता खलेगी, अगर किसी के पास समानता है तो उसे स्वतंत्रत होने की बड़ी तलब होगी। फिर भी आज जब ऊंचे मंचों से इन दोनों शब्दों का उच्चारण किया जाता है तो ये दोनों तरह के लोग अपनी-अपनी लकड़ी उठा लेते हैं। हर कोई किसी न किसी की समानता चाहता है और किसी न किसी समानता से स्वतंत्र होना चाह रहा है। आप खुद से पूछिए! ठीक है! अकेले में पूछिए पर पूछिए! अब आज दुनिया की दशा ये है कि लोग अपनी जमीन लीज पर देकर, दूसरे के यहाँ किरायेदार बनकर रह रहे हैं पर क्या करें, मजबूरी है। रोजगारमेव जयते! जब मन में भारी अंतर्द्वंद हो, धर्मसंकट हो, निर्णय विकट हो, वृथा का झंझट हो, भारी संशय हो, बुद्धि निराश्रित हो तब ऐसे में हमेशा देखिये कि कल के लिए जो रोटी खानी है, वो खेत से लेकर, किस चक्की तक ले जानी है और फिर रसोई में लाकर किस चूल्हे पर पकानी है। बस इसी सुलझाव के साथ दुनिया चली आ रही है। आप भी पुस्तक पढ़ें और कुछ सोचें। ये दो ख्वाब आप भी जानें, इन्हें समझें और अगली पुस्तक का इंतजार करें।
हर्ष रंजन
ॐ नमः शिवाय!
नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने पेज पर आपका स्वागत है। प्रकाशित तीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।
कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।
ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।
कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!
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