EK THAA ISHWAR एक था ईश्वर: New Satires-2/ नये व्यंग्य-2

<p>नास्तिकता का अपना यह सफ़र बहुत दिलचस्प रहा।</p><p>सामुदायिक ब्लॉग ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर पहली पोस्ट लिखी-‘नास्तिकता सहज है’।</p><p>http://nastikonblog.blogspot.<wbr>in/2010/04/blog-post_24.html</p><p>अच्छी बहस चली। दो-एक पोस्ट और लिखीं। आखि़री पोस्ट पर ज़बरदस्त बहस छिड़ गई, इतनी कि प्रतिपक्ष के लोग मेरे पीछे-पीछे फ़ेसबुक पर चले आए और बताने लगे कि नास्तिक होने या बने रहने के क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं। उसी दिन मैंने फ़ेसबुक पर ‘नास्तिकThe Atheist’  नाम से ग्रुप बना दिया। इसमें बारह-तेरह लोग थे जिनमें से संभवतः कुछ वामपंथी और कुछ बसपाई मित्र थे। एक नया काम यह किया कि दूसरों की तरह हमने अपनी तरफ़ से किसीको ‘ऐड’ नहीं किया बल्कि जो लोग ख़ुद रिक्वेस्ट करते थे उन्हीं मे से कुछ को/सबको ले लेते थे।</p><p>एक काम यह किया कि हमने अपनी पोस्टों/विचारों या तर्कों को आस्तिकता के उन्हीं तर्कों तक सीमित रखा जो हमारे आस्तिक मित्र रोज़मर्रा के जीवन में इस्तेमाल करते हैं। अणु-परमाणु की बहसों की हमने तथाकथित ईश्वर के संदर्भ में क़तई परवाह नहीं की। छोटी से छोटी बात पर तर्क रखे, बहस की। नये से नये तर्क जो पहले कभी रखे नहीं गए थे। साल-भर के अंदर ग्रुप के बाहर भी नास्तिकता पर काफ़ी स्टेटस दिखाई देने लगे। सबसे मज़ेदार बात यह हुई कि जो लोग नास्तिकता का नाम भी लेने में हिचकिचाते थे, वे ख़ुदको असली नास्तिक और हमें नक़ली नास्तिक बताने लगे। मिलते-जुलते नामों से ग्रुप खुलने लगे। ख़ुद मैंने भी एक ब्लॉग ‘नास्तिकThe Atheist’ नाम से बना डाला।</p><p>http://nastiktheatheist.<wbr>blogspot.in/</p><p>ग्रुप भी फ़ेसबुक पर चल ही रहा है और मैं ज़्यादा लफ़्फ़ाज़ी करके आपको बोर नहीं करना चाहता ; इस व्यंग्य-संग्रह को पढ़कर बाक़ी अंदाज़ा आप ख़ुद ही लगा लेंगे।</p><p>अगर आप नास्तिक नहीं हैं तो इस संग्रह को इसलिए पढ़ सकते हैं कि पढ़कर हमारी धज्जियां उड़ा सकें, हमें शर्मिंदा कर सकें, हमें सोचने पर मजबूर कर सकें।</p><p><b><i>( नास्तिकता पर अगली क़िताब जल्दी ही.... )</i></b></p><p>-संजय ग्रोवर</p><p>10-07-2015</p><p><b>यहां, मित्रों/पाठकों की प्रतिक्रियाओं के जवाब देने के लिए उचित जगह फ़िलहाल दिखाई नहीं दे रही, इसलिये यहीं जवाब दिए दे रहा हूं-</b></p><p><b>Dear Anshul, </b></p><p><b>Thanks for balancing the matter because for a long time many people with your kind of logical thinking were declaring me Hindu or R.S.S. supporter, symbolically, on facebook.</b></p><p><b>If my parents/surroundigs compel me to follow some illogical rituals, should i oppose my parants/surroundins or others&#39; parants/surroundings?</b></p><p><b>You wrote-</b></p><p><b>Why ,there is not a single note written on any other religion. We all know,why?</b></p><p><b>You think this is logic ? Blaming someone without any proof ?</b></p><p><b>I do not think in the language of My Dharma or Their Dharma. I oppose every illogical and imposed thing/s which are obstakles before me and humanity. I prefer sometimes reality and straightforwardness  in comparision of showee polite.</b></p><p><b>Thanks, carry on commenting.</b></p><p></p><p><b>Sanjay Grover</b></p><p><b>17-01-2017</b></p><p><b>शोभाराम वर्मा जी</b>, ये सब बक़वास क्यों है, कारणों के साथ बताते तो मैं ज़रुर जवाब देने की कोशिश करता।</p><p><b>सोनम चौधरी जी</b>, अगर भगवान निराश व्यक्तियों के काम आता है तो वह उन्हें निराश बनाता ही क्यों है ? भगवान क्या कोई छंटा हुआ राजनेता है कि पहले लोगों को निराश करता है, उनके काम बिगाड़ता है फिर ख़ुद ही उनका काम सुधारने के नाम पर अपनी इमेज बनाने चला आता है ? अंततः ग़रीब और निराश लोगों को मिलता क्या है भगवान से ? अगर भगवान निराशों और ग़रीबों के इतना क़रीब है तो भगवान को पाने के लिए सभी अमीर और आशावादी भक्त ग़रीब और निराश क्यों नहीं हो जाते ? आप कब ग़रीब हो रहीं हैं ?</p><p><b>साहिल चौहान जी</b>, किसी काल्पनिक चीज़ पर विश्वास करना और किसी वास्तविक चीज़ पर विश्वास करना दो अलग-अलग बातें हैं।</p><p>Dear <b>Sahil</b>, I am not that kind of atheist. You must understand the difference between believing a hypothetical thing and believing in a genuine thing.</p><p><b><i>-संजय ग्रोवर</i></b></p><p>06-08-2017</p><br>

(संजय ग्रोवर की क़िताबें-

अच्छी क़िताबें, सस्ती क़िताबें)
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About the author

ABOUT the AUTHER  लेखक के बारे में

ʘ SANJAY GROVER संजय ग्रोवर :

ʘ सक्रिय ब्लॉगर व स्वतंत्र लेखक.

ʘ Active Blogger and Freelance Writer.

ʘ मौलिक और तार्किक चिंतन में रुचि.

ʘ Inclined toward original and logical thinking.

ʘ नये विषयों, नये विचारों और नये तर्कों के साथ लेखन.

ʘ loves writing on new subjects with new ideas and new arguments.

ʘ फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी सक्रिय.

ʘ Also active on Facebook and Twitter.

ʘ पत्र-पत्रिकाओं में कई व्यंग्य, कविताएं, ग़ज़लें, नारीमुक्ति पर लेख आदि प्रकाशित.

ʘ Several satires, poems, ghazals and articles on women's lib published in various journals.

ʘ बाक़ी इन लेखों/व्यंग्यों/ग़जलों/कविताओं/कृतियों के ज़रिए जानें :-)

ʘ Rest learn by these articles/satires/ghazals/poems/creations/designs :-)

ʘ mob : 91-8585913486

ʘ blogs : www.samwaadghar.blogspot.com

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1.      सरल की डायरी Saral Ki Diary  

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14.  चालू वर्सेज़ निराकार

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15.  सवा अरब भ्रष्टाचार

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16.  ये कोई बात हुई

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Publisher
Sanjay Grover
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Published on
Jul 12, 2015
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Pages
126
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Language
Hindi
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Genres
Humor / Topic / Religion
Philosophy / Logic
Young Adult Nonfiction / Religion / Agnosticism & Atheism
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लीक से लड़ते गजलकार हैं संजय ग्रोवर

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संजय ग्रोवर लीक से लड़ते गजलकार हैं। इनकी गजलें अल्फ़ाज और अंदाज की कसीदाकारी में न फंसकर जिंदगी की सच्चाइयों को बाहर निकालने के लिए जद्दोजहद करती दिखाई देती हैं। ये सच को झूठ से, असली को नकली से, भलमनषी को कपट से आगाह करती हैं, तो कई बार एकाकी अंतर्मन को खंगालती, धोती, सुखाती नजर आती हैं। सांप्रदायिक विभेद, जातिगत दंभ और कूरीतियों के विरुद्ध तो ये अत्यंत मारक और पैनी धार आख्तियार कर लेती हैं।

 

संजय की रचनाओं को ब्लॉग और अन्य सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर पढ़ने वाली पीढ़ी में बहुत कम लोग जानते होंगे कि दो-ढाई दशक पहले इनकी गजलों ने देश की लगभग सभी अग्रणी पत्र-पत्रिकाओं में अच्छी पैठ बना रखी थी और ये हिंदी गजल के सुपरिचित नामों में शुमार रहे हैं। हालांकि लेखन को पेशेवर मायनों में वह अनवरत या झटपटवादी परिपाटी से नहीं जोड़ पाए और बीच के कई वर्षों में बहुत कम लिखा या गायब से रहे। छपने-छपाने की होड़ में पड़ना इनकी फितरत नहीं है, शायद इसीलिए हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में सुपरिचित गजलकार के रूप में जगह बनाने के करीब एक दशक बाद वर्ष 2003 में इनका पहला गजल संग्रह ‘खुदाओं’ के शहर में आदमी प्रकाशित हुआ। इसकी दर्जनों गजलें सामाजिक कसौटी पर समय की सीमा को पार कर आज भी प्रासंगिक बनी हुई हैं, जिन्हें हाल ही में संजय ने कुछ नई गजलों के साथ ई-बुक का रूप दिया है और वे ऑनलाइन उपलब्ध हैं। उसके बाद के संग्रह उन्होंने डिजिटल रूप में ही प्रकाशित किया है। ट्वीटर और फेसबुक पर वनलाइनर पोस्ट के जमाने में संजय ने भी सोशल मीडिया पर दस्तक दी है और कई बार एकाध शेर के जरिए भी अपने दिल की बात रख देते हैं।

 

एक गजल में वह कहते हैं ‘ या तो मैं सच कहता हूं या फिर चुप ही रहता हूं ’ और सही मायनों में यही उनका रचनात्मक व्यक्तित्व है। उन्होंने सामाजिक मिथकों, पाखंड और दिखावटी जीवन मूल्यों पर करारी चोट की है। वह झूठ को उसकी आखिरी परत तक छीलते नजर आते हैं।

मसलन, 

‘सच के बारे में झूठ क्या बोलूं, 

सच भी झूठों के काम आना है’

या फिर

‘सच जब आपने आप से बातें करता है

झूठा जहां कहीं भी हो वह डरता है’

 

‘मोहरा, अफवाहें फैलाकर,

बात करे क्या आंख मिलाकर

औरत को मां बहिन कहेगा,

लेकिन थोड़ा आंख दबाकर ’

 

उन्होंने अपनी गजलों में वैचारिक और चारित्रिक दोहरेपन की भी खूब खबर ली है। जहां कहीं विरोधाभास मिला उसे शेर का जरिया बना डाला। इसकी बानकी के तौर पर कुछ गजलों का एक-एक मतला हाजिर है-

‘पद सुरक्षा धन प्रतिष्ठा हर तरह गढ़ते रहे

और फिर बोले कि हम तो उम्र भर लड़ते रहे’

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‘अपनी तरह का जब भी उनको माफिया मिला

बोले उछलकर देखो कैसा काफ़िया मिला’

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‘दिखाने को उठना अकेले में गिरना

इसी को बताया है पाने की दुनिया’

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‘बिल्कुल ही एक जैसी बातें बोल रहे थे

वे रोज एक दूसरे को खोल रहे थे’

 

 

संजय ने सामाजिक रूढ़ियों, स्वार्थपरक रिस्मो-रिवाज और बनावटी मर्यादा के जाल में कसमसाते जीवन का बड़ी संजीदगी से चित्रण किया है।

 

‘ लड़के वाले नाच रहे थे, लड़की वाले गुमसुम थे

याद करो उस वारदात में अक्सर शामिल हम तुम थे’

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 ‘ नम्र लहज़ों के लिफ़ाफ़ों में जदीदे-मुल्क़

पकड़े जाते हैं हमेशा कन्यादानों ---

‘आन को ईमान पे तरजीह वाह रे वाह

वहशी को इंसान पे दरजीह वाह रे वाह’

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नाक पकड़कर घूम रहे थे सदियों से

अंदर से जो खुद पाख़ाने निकले हैं

 

 

सांप्रदायिकता, जातिवाद और इनके राजनीतिकरण को लेकर संजय बेहद सचेत और सक्रिय नजर आते हैं। वह शेर दर शेर इनकी जहरीली प्रवृत्तियों को उजागर करते रहे हैं। यह उनके लेखन और कृतित्व के केंद्रीय विषयों में रहा है।

 

‘हिंदू कि मुसलमां, मुझे कुछ याद नहीं है

है शुक्र कि मेरा कोई उस्ताद नहीं है’

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‘छोटे बच्चों को सरेआम डराया तुमने

ऐसे हिंदू औ’मुसलमान बनाया तुमने ‘

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‘काटने की, बांटने की बात छोड़ेंगे नहीं

आदमियत छोड़ देंगे जात छोड़ेंगे नहीं’

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न मद्रासी में रहता हूं न न पंजाबी में रहता हूं

यूं ताले तो बहुत हैं मैं मगर चाबी में रहता हूं

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तो क्या संजय ग्रोवर चरम यथार्थ, आक्रोश, निराशा, बेचैनी और वैचारिक अवसाद की गजलगोई करते हैं? ऐसा नहीं लगता। उनके कई शेर अंधेरे में दिए जलाते, उम्मीदों को जगाते और संघर्ष का हौसला बढ़ाते नजर आते हैं। वह कहते हैं-

‘अपनी आग बचाए रखना,

सही वक्त जब आए, रखना

खिसक रही हों जब बुनियादें,

सच्चाई के पाए रखना’

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‘र्दद को इतना जिया कि दर्द मुझसे डर गया

और फिर हंसकर के बोला यार मैं तो मर गया’ 

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ऐसा नहीं कि भीड़ में शामिल नहीं हूं मैं

लेकिन धड़कना छोड़ दूं वो दिल नहीं हूं मैं

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‘मौत से पहले मौत क्यों आए

अपनी मर्जी का कुछ किया जाए’।

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संजय ने उस दौर में गजलगोई शुरू की थी, जब दुष्यंत कुमार की नींव पर हिंदी गजलकारों की नई पीढ़ियां अपनी ईंटें जमातीं आ रही थीं। उर्दू काव्‍यभाषा के संस्‍कार को हिन्‍दी में लेकर चलने का जोखिम यह भी है कि आपको टुटपूंजिया कवि के रूप में नजरंदाज कर दिया जाए। लेकिन संजय ने अपने संकोची स्वभाव, अनौपचारिक लेखन प्रवृत्तियों और अनियमित रचनाकर्म के बावजूद हिंदी गजल में न सिर्फ अपना स्पेस हासिल किया, बल्कि पहचान भी बनाई है। वैसे तो वह गजल में भाषिक-विधान और संरचना को लेकर काफी सतर्क दिखते हैं, लेकिन विचारों के आगे वह शिल्प को तरजीह नहीं देते। कई शेर में छंद और लयबद्दता को दरकिनार करते और सीधे अपनी बात कहते नजर आते हैं।

 

प्रमोद राय


ख़ुद ही लिखता हूं, ख़ुद ही कम्पोज़ करता हूं, ख़ुद ही तस्वीरें खींचता हूं, ख़ुद ही कवर बनाता हूं, ख़ुद ही भूमिका लिखता हूं, फिर इतने सस्ते में बेच देता हूं.......


यह पागलपन नही तो और क्या है ?


न किसीसे लोकार्पण कराता हूं, न किसीसे पब्लिसिटी कराता हूं, न बदनामी की, अफ़वाहों की, विज्ञापनों की, टीवी की, फ़िल्मों की चिंता करता हूं.....


यह पागलपन नही तो और क्या है ?


फिर भी आप पढ़ते  हैं,  यह ......... नही तो और क्या है ;)


आप तो यहीं हंसने लगे, अंदर भी बहुत कुछ है-

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(पागलखाने के सभी पागलों को समर्पित)

 

पागलों से मिलने के लिए नीचे के दो लिंकों पर जाईए-

 

1.

http://paagal-khaanaa.blogspot.com/

 

2.

https://www.facebook.com/groups/PaagalBachchePaagalAchchhe/


"पूछिए….. आप कैसे समय में से १ घंटे की अवधी जीत सकते हैं?” 

.

मारए ओ’कोनारे की घडी ३ बजकर ५७ मिनट पर बंद पड चुकी हैं। परंतु उसके सामने इससे भी बहुत बडी मुसीबतें खडी हैं। जब वह अपनी घडी ठीक कराने के लिए घडीसाज के पास जाती है तो अपने आपको एक अजीबोगरीब पुरस्कार की हकदार पाती हैं। उसे अपनी जिंदगी का एक घंटा दोबारा जीने का मौका मिल जाता है। अपने अतीत के साथ कोई कितनी खिलवाड कर पाएगा इस पर सख्त और कडे नियम लागू हैं। मारए को यह चेतावनी भी मिलती है कि वह ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती जिससे समय के प्रति विरोधाभास निर्माण हो। क्या मारए अपनी उस गलती को सुधार पाएगी जिसे वह जिंदगी में सबसे ज्यादा कोसती है? "एक मार्मिक कहानी, अपनी सबसे बडी गलती सुधारने का लाखों में एक मौका!"- पाठक का विष्लेषण "एक गतिमान और नाटकीय कहानी। यदि हमें अपने अतीत को बदलने का मौका मिला तो क्या हम उसे आजमाएंगे?" -पाठक का विष्लेषण "एक मार्मिक लघु कहानी जो नॉर्स (स्कैंडेनेविया प्रांत) पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं। समय एक उपहार है, और कई बार एक आखरी मौका," - डेल एमीदइ, लेखक कैसा होगा यदि आप इसे दुबारा जी सके? 

*

English translation: Marae O’Conaire has much bigger problems than the fact her watch stopped at 3:57 p.m. When she brings her watch to a kindly repairman, she learns she has won a peculiar prize, a chance to re-live a single hour of her life. But Fate has strict rules about how one can go poking in the past, including the warning that she can’t do anything that would create a time-paradox. Can Marae make peace with the mistake she regrets most in this world? A story about racism, regret, and second chances set in the historic mill city of Lowell, Massachusetts.

*

Keywords: Hindi language books, Hindi books, Hindi language edition, Hindi edition, Norse mythology, Norns, time travel, Fate, interracial dating, prejudice, racism, second chances, Hindi language, Hindi edition, Hindi language edition, Hindi books, Hindi language books, Hindi language novels, Hindi books, Hindi novels, Hindi romance, Hindi language romance, reincarnation, Norse mythology, Hindi language fantasy, हिन्दी भाषा की किताबें, हिंदी किताबें, हिंदी भाषा संस्करण, हिंदी संस्करण, नॉर्स पौराणिक कथाओं, Norns, समय यात्रा, भाग्य, अंतरजातीय डेटिंग, पूर्वाग्रह, नस्लवाद, दूसरी संभावना, हिंदी भाषा, हिंदी संस्करण, हिंदी भाषा संस्करण, हिंदी किताबें, हिंदी भाषा की किताबें, हिंदी भाषा उपन्यास, हिंदी किताबें, हिंदी उपन्यास, हिंदी रोमांस, हिंदी भाषा रोमांस, पुनर्जन्म, नॉर्स पौराणिक कथाओं, हिंदी भाषा कल्पना,

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