पश्चिमी इतिहास के मुताबिक विज्ञान ग्रीक लोगों में शुरू हुआ और यूरोप में पुनर्जागरण के बाद उसका विकास हुआ। इस कहानी को तीन चरणों में गढ़ा गया।
पहला, क्रुसेड के दौरान एक अरब किताबघर ईसाइयों के कब्जे में आया और उन किताबों का सामूहिक अनुवाद हुआ। धार्मिक उन्माद के उस दौर में दुश्मन से सीखना कैसे उचित ठहराया जा सकता था! लिहाजा कहा गया कि इन किताबों में जो विज्ञान है वह मूलतः ग्रीक की देन है। इस पुस्तक में इस प्रक्रिया का दो प्रमुख मामलों -- यूक्लिड (ज्यामिति) और क्लाॅडिअस टोलेमी (खगोल विज्ञान) -- के जरिए इसका खुलासा किया गया है, क्योंकि दोनों ही मनगढ़ंत हस्तियाँ थीं।
दूसरा, इंक्विजिशन के दौरान, समूचे दुनिया के वैज्ञानिक ज्ञान को फिर धर्मशास्त्राीय-रूप-से-सही मूल दिया गया। कहा गया कि यह विज्ञान दूसरों से संचारित नहीं था, बल्कि यूरोपियों ने उसकी ”स्वतंत्र रूप से पुनः खोज“ की। कोपर्निकस और न्यूटन (कैल्कुलस) के मामले इस ”पुनः खोज द्वारा क्रांति“ को दर्शाते हैं।
तीसरे, हड़पे गए इस ज्ञान की पुनर्व्याख्या कर उसे क्रुसेड के बाद के क्रिस्तानी धर्मशास्त्र के अनुकूल बनाया। नस्लवादी और औपनिवेशिक इतिहासकारों ने इसका फायदा उठाते हुए यह कहा कि धर्मशास्त्राीय रूप से सही वैज्ञानिक ज्ञान (ज्यामिति, कैल्कुलस आदि) सिर्फ यूरोप में ही मौजूद था।
इन प्रक्रियाओं से ज्ञान का हड़पा जाना अब भी जारी है।
चंद्रकांत राजू ने मुंबई से भौतिकी और गणित में स्नातक और स्नातकोत्तर किया और भारतीय सांख्यिकी संस्थान से पी.एचडी. पूरी की। पुणे और भोपाल के विश्वविद्यालयों में तीन अलग विभागों में पढ़ाया और कंप्यूटर विभाग के अध्यक्ष रहे। भारत का पहला सुपरकंप्यूटर परम को बनाने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। वे भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के जरनल के संपादक रह चुके हैं। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला और नेहरू मेमोरियल म्युजियम एंड लाइब्रेरी, नई दिल्ली इत्यादि के फेलो रह चुके हैं। उन्होंने कई विषयों पर किताबें लिखीं हैं : भौतिकी पर (टाइम: टूवार्डस ए कंसिस्टेंट थ्योरी, क्लूवर, 1994), गणित के इतिहास और दर्शन पर (कल्चरल फाउंडेशंस आफ मैथेमैटिक्स, पियरसन, 2007) और विज्ञान, धर्म और नैतिकता के इंटरफेस पर (द इलेवन पिक्चर्स आफ टाइम, सेज, 2003)। उनके अनुसार बेइंसाफ राजनीति के अनुकूल समय की अवधारणा धर्मशास्त्रा से विज्ञान (गणित, भौतिक विज्ञान) में घुस गई हैं। वह सोचते हैं कि बराबरी और सद्भाव के हित में इस धर्मशास्त्रा को विज्ञान से बेदखल करना होगा।