धर्मरहस्य (Hindi Self-help): Dharma Rahasya (Hindi Self-help)

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प्रस्तुत पुस्तक स्वामी विवेकानन्द के धर्म सम्बन्धी प्रसिद्ध व्याख्यानों का संग्रह है। इनमें धर्म के सार्वभौमिक स्वरूप के महत्व को अत्यन्त विशद रीति से पुरस्सर किया गया है तथा समस्त धर्मों के अन्तिम ध्येय - आत्मदर्शनलाभ के उपायों पर भी प्रकाश डाला गया है। स्वामीजी ने धर्म के व्यावहारिक स्वरूप की चर्चा करते हुए यह भी सिद्ध करने की चेष्टा की है कि धर्म द्वारा समाज में नवजीवन का किस प्रकार संचार हो सकता है। उन्होंने बड़े प्रबल तर्कों द्वारा यह आग्रह किया है कि वर्तमान युग में उसी धर्म की आवश्यकता है जो ''मनुष्य'' का निर्माण कर सके।
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About the author

स्वामी विवेकानन्द(जन्म: १२ जनवरी,१८६३ - मृत्यु: ४ जुलाई,१९०२)
वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे। उनका वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था। उन्होंने अमेरिका स्थित शिकागो में सन् १८९३ में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया था। भारत का आध्यात्मिकता से परिपूर्ण वेदान्त दर्शन अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तृता के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत "मेरे अमरीकी भाइयो एवं बहनों" के साथ करने के लिये जाना जाता है। उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था। जीवन की महत्त्वपूर्ण तिथियाँ12 जनवरी 1863 -- कलकत्ता में जन्म1879 -- प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश1880 -- जनरल असेम्बली इंस्टीट्यूशन में प्रवेशनवंबर 1881 -- रामकृष्ण परमहंस से प्रथम भेंट1882-86 -- रामकृष्ण परमहंस से सम्बद्ध1884 -- स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण; पिता का स्वर्गवास1885 -- रामकृष्ण परमहंस की अन्तिम बीमारी16 अगस्त 1886 -- रामकृष्ण परमहंस का निधन1886 -- वराहनगर मठ की स्थापनाजनवरी 1887 -- वराह नगर मठ में संन्यास की औपचारिक प्रतिज्ञा1890-93 -- परिव्राजक के रूप में भारत-भ्रमण25 दिसम्बर 1892 -- कन्याकुमारी में13 फ़रवरी 1893 -- प्रथम सार्वजनिक व्याख्यान सिकन्दराबाद में31 मई 1893 -- मुम्बई से अमरीका रवाना25 जुलाई 1893 -- वैंकूवर, कनाडा पहुँचे30 जुलाई 1893 -- शिकागो आगमनअगस्त 1893 -- हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रो॰ जॉन राइट से भेंट11 सितम्बर 1893 -- विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में प्रथम व्याख्यान27 सितम्बर 1893 -- विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो में अन्तिम व्याख्यान16 मई 1894 -- हार्वर्ड विश्वविद्यालय में संभाषणनवंबर 1894 -- न्यूयॉर्क में वेदान्त समिति की स्थापनाजनवरी 1895 -- न्यूयॉर्क में धार्मिक कक्षाओं का संचालन आरम्भअगस्त 1895 -- पेरिस मेंअक्टूबर 1895 -- लन्दन में व्याख्यान6 दिसम्बर 1895 -- वापस न्यूयॉर्क22-25 मार्च 1896 -- फिर लन्दनमई-जुलाई 1896 -- हार्वर्ड विश्वविद्यालय में व्याख्यान15 अप्रैल 1896 -- वापस लन्दनमई-जुलाई 1896 -- लंदन में धार्मिक कक्षाएँ28 मई 1896 -- ऑक्सफोर्ड में मैक्समूलर से भेंट30 दिसम्बर 1896 -- नेपल्स से भारत की ओर रवाना15 जनवरी 1897 -- कोलम्बो, श्रीलंका आगमनजनवरी, 1897 -- रामनाथपुरम् (रामेश्वरम) में जोरदार स्वागत एवं भाषण6-15 फ़रवरी 1897 -- मद्रास में19 फ़रवरी 1897 -- कलकत्ता आगमन1 मई 1897 -- रामकृष्ण मिशन की स्थापनामई-दिसम्बर 1897 -- उत्तर भारत की यात्राजनवरी 1898 -- कलकत्ता वापसी19 मार्च 1899 -- मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना20 जून 1899 -- पश्चिमी देशों की दूसरी यात्रा31 जुलाई 1899 -- न्यूयॉर्क आगमन22 फ़रवरी 1900 -- सैन फ्रांसिस्को में वेदान्त समिति की स्थापनाजून 1900 -- न्यूयॉर्क में अन्तिम कक्षा26 जुलाई 1900 -- योरोप रवाना24 अक्टूबर 1900 -- विएना, हंगरी, कुस्तुनतुनिया, ग्रीस, मिस्र आदि देशों की यात्रा26 नवम्बर 1900 -- भारत रवाना9 दिसम्बर 1900 -- बेलूर मठ आगमन10 जनवरी 1901 -- मायावती की यात्रामार्च-मई 1901 -- पूर्वी बंगाल और असम की तीर्थयात्राजनवरी-फरवरी 1902 -- बोध गया और वाराणसी की यात्रामार्च 1902 -- बेलूर मठ में वापसी4 जुलाई 1902 -- महासमाधि
 

 

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Publisher
Bhartiya Sahitya Inc.
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Published on
Apr 4, 2014
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Pages
54
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ISBN
9781613013472
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Language
Hindi
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Genres
Foreign Language Study / Hindi
Philosophy / Religious
Religion / Hinduism / General
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स्वामी विवेकानन्दजी के कुछ महत्वपूर्ण व्याख्यान तथा उनके कुछ प्रवचनों का सारांश ''आत्मतत्त्व'' के रूप में पाठकों के सम्मुख है। 'आत्मा', ' आत्मा:उसके बन्धन तथा मुक्ति', 'आत्मा, प्रकृति तथा ईश्वर', ' आत्मा का स्वरूप और लक्ष्य' आदि पुस्तक के विभिन्न, अध्यायों में स्वामीजी ने आत्मा के स्वरूप, उसके बन्धन तथा मुक्ति का विवेचन किया है। स्वामीजी? का कथन है - 'आत्मानुभूति ही वस्तुत: धर्म है।' अत: आत्मा के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर उसकी प्रत्यक्ष उपलब्धि के द्वारा अज्ञान के बन्धनों से मुक्त होना ही मानव-जीवन का चरम लक्ष्य है। आत्मस्वरूप की मीमांसा करनेवाले तीन मत - द्वैत, विशिष्टाद्वैत और अद्वैत का विश्लेषण कर स्वामीजी ने इस पुस्तक में स्पष्टत: दर्शा दिया है कि ये तीनों मत परस्पर विरोधी नहीं, अपितु परस्पर पूरक हैं। स्वामीजी ने इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला है कि आत्मानुभूति प्राप्त करने के लिए बाह्य और आन्तर प्रकृति पर विजय प्राप्त करना आवश्यक हैं तथा यह विजय- लाभ वासना-त्याग एवं अन्तःशुद्धि के बिना सम्भव नहीं। मानव-जीवन के सफल होने के लिए तथा सच्चे सुख एवं शान्ति का अधिकारी बनने के लिए आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्यतया आवश्यक है और इसीलिए इस पुस्तक में स्वामीजी ने जो मार्गदर्शन कराया है वह सभी के लिए निश्यचरूपेण श्रेयस्कर है।
वस्तुतः जीवन और शिक्षा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। शिक्षा जीवन-पर्यंत चलनेवाली प्रक्रिया है। आदमी जन्म से लेकर मृत्यु-शय्या तक शिक्षा ग्रहण करता रहता है। अलग-अलग विद्वानों ने शिक्षा के अलग-अलग विभाग किए हैं, किंतु प्रमुखतः शिक्षा दो तरह की हो सकती है-एक तो औपचारिक, जो कि एक पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार निर्धारित पाठ्यक्रम और निर्धारित समय-सीमा के अंतर्गत दी जाती है तथा दूसरी अनौपचारिक शिक्षा, जिसे व्यक्ति कहीं भी, किसी से भी, कभी भी ग्रहण कर सकता है। जैसे कि एक कहानी में एक पराजित राजा ने मकड़ी से शिक्षा ग्रहण की और अंततः विजयी हुआ। ये जो बड़े-बड़े ग्रंथ हैं, जिन्हें बड़े-बड़े विद्वानों ने लिखा है-ये भी अनुभवों का संकलन मात्र हैं, जिसका हस्तांतरण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में शिक्षा के माध्यम से होता है। इन ग्रंथों का प्रयोजन यही होता है कि हमारी आनेवाली पीढ़ी को वे दुःख न सहने पड़ें, जो कि अज्ञानतावश उन्होंने सहे हैं। किंतु वर्तमान में यदि हम अपना अवलोकन करें तो हमारी मानसिकता ऐसी हो गई है जिसमें हम पुराने अनुभवों से सीख न लेकर उस विषय पर स्वयं प्रयोग करके सीखने का प्रयास करते हैं। यह अच्छी बात है, किंतु इसकी हानि भी बहुत है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि इसमें एक तो हमारा कीमती समय बरबाद होता है, साथ-ही-साथ कभी-कभी हम केवल प्रयोग के उपकरण मात्र बनकर रह जाते हैं या कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम एक प्रायोगिक शृंखला के सदस्य बन जाने के कारण प्रयोग के बाद अगले प्रयोग में फँसते जाते हैं और अपने जीवन को नष्ट कर देते हैं। इतना सबकुछ जानने के बाद भी हम स्वयं प्रयोग करने में ही ज्यादा आस्था रखते हैं।
जब प्रेम का यह उच्चतम आदर्श प्राप्त हो जाता है, तो ज्ञान फिर न जाने कहाँ चला जाता है। तब भला ज्ञान की इच्छा भी कौन करे? तब तो मुक्ति, उद्धार, निर्वाण की बातें न जाने कहाँ गायब हो जाती हैं। इस दैवी प्रेम में छके रहने से फिर भला कौन मुक्त होना चाहेगा? ''प्रभो! मुझे धन, जन, सौन्दर्य, विद्या, यहाँ तक कि मुक्ति भी नहीं चाहिए। बस इतनी ही साध है कि जन्म जन्म में तुम्हारे प्रति मेरी अहैतुकी भक्ति बनी रहे।'' भक्त कहता है, ''मैं शक्कर हो जाना नहीं चाहता, मुझे तो शक्कर खाना अच्छा लगता है।'' तब भला कौन मुक्त हो जाने की इच्छा करेगा? कौन भगवान के साथ एक हो जाने की कामना करेगा? भक्त कहता है, ''मैं जानता हूँ कि वे और मैं दोनों एक हैं, पर तो भी मैं उनसे अपने को अलग रखकर उन प्रियतम का सम्भोग करूँगा।'' प्रेम के लिए प्रेम - यही भक्त का सर्वोच्च सुख है
'श्रीमद्भगवद्गीता' आनन्दचिदघन, षडैश्वर्यपूर्ण, चराचरवन्दित, परमपुरुषोत्तम साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य वाणी है। यह अनन्त रहस्यों से पूर्ण है। परम दयामय भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से ही किसी अंश में इसका रहस्य समझ में आ सकता है। जो पुरुष परम श्रद्धा और प्रेममयी विशुद्ध भक्ति से अपने हृदय को भरकर भगवद्गीता का मनन करते हैं, वे ही भगवत्कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव करके गीता के स्वरूप की किसी अंश में झाँकी कर सकते हैं। अतएव अपना कल्याण चाहनेवाले नर-नारियों को उचित है कि वे भक्तवर अर्जुन को आदर्श मानकर अपने में अर्जुन के-से दैवी गुणों का अर्जन करते हुए श्रद्धा-भक्तिपूर्वक गीता का श्रवण, मनन, अध्ययन करें एवं भगवान् के आज्ञानुसार यथायोग्य तत्परता के साथ साधन में लग जायँ। जो पुरुष इस प्रकार करते हैं, उनके अन्तःकरण में नित्य नये-नये परमानन्ददायक अनुपम और दिव्य भावों की स्फुरणाएँ होती रहती हैं तथा वे सर्वथा शुद्धान्तःकरण होकर भगवान् की अलौकिक कृपासुधा का रसास्वादन करते हुए शीघ्र ही भगवान् को प्राप्त हो जाते हैं।
हमारे जीवन का लक्ष्य जैसा भी हो उसे पाने के लिए पहला कदम हमें ही उठाना पड़ता है। एक हजार मील की दूरी तय करने के लिए शुरुआत पहले कदम से ही होती है। इस पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में लिखे अनमोल सफलतम नियमों का पूरा-पूरा लाभ लेने के लिए जरूरी है कि आप बहुत ही धैर्य एवं विश्वास के साथ समझते हुए पढ़ें। अभी तक जिसका लक्ष्य निर्धारित नहीं हुआ होगा तो उसका लक्ष्य तय हो जायेगा और जिसका लक्ष्य निर्धारित होगा तो उसको उसका लक्ष्य पाने का सरल उपाय मिल जायेगा। समस्या किसी भी क्षेत्र से हो उसका समाधान इस पुस्तक को पढ़ते-पढ़ते मिल ही जायेगा। नकारात्मक विचारों में ही सारी समस्याओं का कारण छिपा होता है। समाधान पाने के लिए उन कारणों को कैसे खोजा जाये। इसका तरीका इस पुस्तक में दिया गया है। बेहद सावधानी से इस पुस्तक को पढ़ने की जरूरत है। क्योंकि कब किस पेज पर आपको वह उपाय मिल जाय जिसके मिलते ही आपके मार्ग की कुछ ऐसी बाधाएं समाप्त हो जायें जिनके होने से आपका विकास न हो रहा हो और आप लम्बे समय से उसी स्थान पर रुककर अपने आपसे ही युद्ध लड़ रहे हों। ऐसे संकट के समय में यह पुस्तक आपकी जरूर मदद करने वाली है। इस पुस्तक को छोटे-छोटे अध्यायों में लिखने का उद्देश्य मात्र यह है कि आपका समय धन एवं उर्जा का न्यूनतम् निवेश हो और लाभ की प्राप्ति अधिकतम् हो। टकराव और समस्या का जन्म दूसरों को बदलने के परिणाम स्वरूप होता है। इसलिए समाधान और सफलता पाने के लिए खुद को बदलने के लिए तैयार रहें। हर दिन सफल होने के नियमों पर चलने वाले ही एक दिन महानतम् सफलताओं एवं उपलब्धियों को प्राप्त कर ही लेते हैं। एक दिन में ही अधिकतम् सफलता चाहने वाले लोगों को निश्चित ही नकारात्मक परिणामों के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि यही सृष्टि का अटल नियम है
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