ये कोई बात हुई Ye Koi Baat hui: Meri GhazaleN मेरी ग़ज़लें-1

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CommentsRe: Ye Koi Baat hui/ये कोई बात हुई by sunilbalani
29 April 2012 - 12:27pm

ग़ज़ल की आत्मा है इस की अनुभूति और उसका सोंदर्य है इसकी अभिव्यक्ति , कवि मन की संवेंदनशीलता को जब बुधितत्व के पंख मिलते हैं तो उस शैली से उन ग़ज़लों का जन्म होता है जैसी संजयजी ने इस संग्रह में पिरोई है ....संजय की शायरी का एक प्रभावशाली पक्ष ये है कि उनकी दृष्टि सदैव भीतर के आदमी और उसके गिर्द समाज पर टिकी रहती हैं , जो बात संजयजी की रचनाओं में मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती है वो है उनका बेबाकी से यथार्थ कह देना , जैसे उनकी ये ग़ज़ल

बाबा, बिक्री, बड़बोलापन, चमत्कार थे चौतरफा
तर्क की बातें करने वाले सच्चे लोग कहां गुम थे!
उनपे हंसो जो बुद्ध कबीर के हश्र पे अकसर हंसते हैं
ईमां वाले लोगों को तो अपने नतीजे मालुम थे

एक ग़ज़ल में शब्दों का इस्तेमाल किस तरह से किया जाय, ये बहुत मायने रखता है ...छोटे बहर में बड़ी बात कह जाना एक हुनर है , जो संजयजी के पास यक़ीनन है , गौर करिए यहाँ ग़ज़ल के आखिरी शेर में एक ही शब्द ,फन के उर्दू, अंग्रेजी और उर्दू मायने इसे एक नया आयाम देते हैं ....
असल में रीड़ ही इसकी नहीं है
वो सदियों से इसी फन पे टिका है

उनकी शायरी फूल-चाँद ,जुल्फ और मोह्हबत की शायरी नहीं बल्कि एक विद्रोही मन की अभिव्यक्ति है जो व्यवस्थाओं से परेशान भी है और हैरान भी... मगर कुछ बदल न पाने की असमर्थता से बेबस भी .... उनकी शायरी में हमारे समाज पर.... हमारे दोहरे मापदंडो पर ,गहरे प्रहार हैं ,
इस सदी की आस्था को देखकर मैं डर गया
बच्चे प्यासे मर गए और दूध पी पत्थर गया।
हिन्दू भी नाराज़ मुझसे मुस्लमान भी है खफा
होके इंसान ,यार मेरे, जीते जी मैं मर गया

यह दुखद है की इस दौर में जहाँ रसूख वालों की तुकबंदी को भी हमारा मीडिया शायरी बता रहा है , और इधर उधर से चुराई गयी रचनाओं को इक्कठा करके भी लोग कवि बन गए हैं उन्ही की एक ग़ज़ल के शब्द है
तलघर में आयोजित सूरज
फिर निकला प्रायोजित सूरज
आसमान के पांव पकड़कर
हो जाता अनुमोदित सूरज

मगर मुझे लगता है , उनकी रचनाओं की मौलिकता को न किसी आयोजन की आवश्यता है न प्रयोजन की जरुरत , क्योंकि उनकी रचनाएँ दुष्यंत , अदम की राह पे अग्रसर होती हैं ,जहाँ चढाई पावों से नहीं इरादों से चड़ी जाती है ,और जहाँ दरीचे खुद ही द्वार बन जाते हैं......... आज जहाँ बस भीड़ सच का मायने हुई नज़र आती है उस दौर में संजय की मौलिक शायरी को पड़ना एक सुखद अनुभव है .....ग़ज़ल के हर कद्रदान को इस संकलन को जरुर पड़ना चाहिए ....इसी संकलन के चंद शेर , जो आग्रह भी है और चुनोती भी .....

रफ़्तार को ठुकराइए मेरी ग़ज़ल के संग
कुछ देर ठहर जाइये मेरी ग़ज़ल के संग
हिन्दू या मुस्लमान बनकर इसको न पढ़े
इंसानियत दिखलाइये मेरी ग़ज़ल के संग....

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About the author

 ʘ SANJAY GROVER संजय ग्रोवर :

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ʘ Inclined toward original and logical thinking.
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ʘ फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी सक्रिय.
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ʘ पत्र-पत्रिकाओं में कई व्यंग्य, कविताएं, ग़ज़लें, नारीमुक्ति पर लेख आदि प्रकाशित.
ʘ Several satires, poems, ghazals and articles on women's lib published in various journals.
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Additional Information

Publisher
Sanjay Grover
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Published on
Feb 9, 2019
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Pages
73
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Language
Hindi
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Genres
Poetry / Asian / General
Poetry / General
Poetry / Subjects & Themes / General
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*न तो क़िताब मूर्ति है न लेखक भगवान*<br><br>बचपन से लेकर काफ़ी बाद तक कितने ही पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ा कि हमारा समाज बहुत भावुक है और पश्चिम बहुत भौतिकतावादी है। मगर व्यवहार में देखा कि हमारे यहां नये, पवित्र कहे जानेवाले, और जन्म-जन्म के कहे जानेवाले रिश्तों की नींव भी पैसे के आधार पर रखी जाती है, बाक़ी कोई भी रीति-रिवाज-त्यौहार लिफ़ाफ़ो के लेन-देन के बिना ज़रा-सा भी आगे नहीं सरकता।<br><br>और आगे चलकर जैसे-जैसे अपना सोचने, ख़ुदको ही डरानेवाले ख़्यालों पर ख़ुलकर विश्लेषण करने का होश और हिम्मत आते गए तो लगने लगा कि हमारी क़िताबों में लोगों ने अपनी आज़माई बातों के साथ सुनी-सुनाई और पढ़ी-पढ़ाई बातें भी अच्छी-ख़ासी मात्रा में लिख रखीं हैं। ऐसे और भी कुछ कारण रहे कि क़िताबों में पहले जैसी रुचि नहीं रह गई।<br><br>क़िताबों के प्रति भगवान-भक्त जैसी आस्था और श्रद्धा पैदा करने की कोशिशें अब ज़रा नहीं सुहातीं। क़िताब को लगभग मूर्ति, लेखक को लगभग भगवान बनाने और बिक्री को चढ़ौती की तरह हासिल करने की मानसिकता अजीब लगती है। क़िताबें ज़रुरी हैं, उपयोगी हैं, मगर लेखक कोई पवित्रता (?) की लाँड्री में से निकला मसीहा नहीं है कि उसके लिखे को पढ़ने के बजाय चरनामृत की तरह खोपड़े पर उड़ेलकर यह सोचा जाए कि इसमें से जो निकलेगा सब अंदर घुसकर अपने-आप कोई रास्ता बनाएगा और हमारे दिल-दिमाग़ को सिर्फ़ सच्चाई की ओर ही ले जाएगा। जैसा मैंने समाज को देखा है, मुझे तो बिलकुल भी नहीं लगता कि लेखक सिर्फ़ सच ही लिखता है। लेकिन हम अगर हिंदू-मुस्लिम या वाम-दक्षिण जैसे खानों में बंटे हो तो हमारे झूठ और सच को समझने के पैमाने पूर्वाग्रही हो ही जाते हैं।<br><br>अगर समाज की जड़ों तक पाखंड पसरा हो तो पाठक भी झूठ को सच की तरह ही पढ़ता है। जो लेखक शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाई जानेवाली क़िताबों में शामिल होने के लिए सर के बल हो जाते हैं उनके द्वारा लिखे गए स्वाभिमान के निबंध में कितना दम और कितनी सच्चाई हो सकती है !?<br><br>तुलसीदास और मनुमहाराज के महाग्रंथ किसीके लिए छाती से लगाए रखने के क़ाबिल हैं तो दूसरे कई लोगों के लिए क़ाबिले-बर्दाश्त भी नहीं हैं।<br><br>क़िताबों के प्रति जागरुकता पैदा करनी चाहिए, श्रद्धा, आस्था और अंधभक्ति नहीं।<br><br>-संजय ग्रोवर<br><br>03-09-2014<br><br><p>on FaceBook</p><p>(09-02-2019) </p>

(संजय ग्रोवर की क़िताबें-

अच्छी क़िताबें, सस्ती क़िताबें)

 नाराज़ राहत इंदौरी राहत की पहचान के कई हवाले हैं - वो रंगों और रेखाओं के फनकार भी हैं, कॉलेज में साहित्य के उस्ताद भी, मक़बूल फिल्म के गीतकार भी हैंऔर हर दिल अज़ीज़ मशहूर शायर भी है I इन सबके साथ राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में इंसान की अंदरुनी और बाहरी कश्मकश के प्रत्यक्षदर्शी भी हैं I राहत की शख़्सियत के तमाम पहलू उनकी ग़ज़ल के संकेतों और प्रतीकों में छलकते हैं I उनकी शायरी की सामूहिक प्रकृति विद्रोही और व्यंगात्मक है, जो सहसा ही परिस्तिथियों का ग़ज़ल के द्वारा सर्वेक्षण और विश्लेषण भी है I राहत की शायरी की भाषा भी उनके विचारों की तरह सूफ़ीवाद का प्रतिबिंब है I प्रचारित शब्दावली और अभिव्यक्ति की प्रचलित शैली से अलग अपना रास्ता बनाने के साहस ने ही राहत के सृजन की परिधि बनाई है I निजी अवलोकन और अनुभवों पर विश्वास ही उनके शिल्प की सुंदरता और उनकी शायरी की सच्चाई है I - निदा फाज़ली
 रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता है चाँद पागल है, अँधेरे में निकल पड़ता है 
उसकी याद आई है साँसों ज़रा आहिस्ता चलो 
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता है 

राहत इंदौरी ने उर्दू शायरी को अवाम में मक़बूल बनाया है, वो अदब के रुख-ओ-रफ़्तार से वाक़िफ़ हैं. - अली सरदार जाफ़री

राहत इंदौरी के पास लफ़्ज़ों से तस्वीरकशी कर देने का अनोखा हुनर हैं, में उसके इस हुनर का फैन हूँ. - एम. एफ. हुसैन 

रा से राम है, रा से राहत है, राम वही है जो राहत दे, जो आहात करता है वो रावण होता है. राहत साहब की शायरी में राहत है, में उनके अंदाज़ को सलाम करता हूँ. - मुरारी बापू 

डॉ. राहत इंदौरी के कलाम बरजस्तगी, मआनी आफ़रीनी और दौर-ए-हाज़िर का अक्स है. उनका वजूद उर्दू शेर-ओ-सुखन और उर्दू ज़बान के लिए बड़ा क़ीमती तोह्फ़ा है. - दिलीप कुमार 

राहत इंदौरी के पास अपने युग की साडी कड़वाहटों और दुखों को खुलकर बयां कर देने की बेपनाह ताक़त है, वो बेजान शब्दों को भी छूते हैं तो उनमें धड़कन पैदा हो जाती है. - प्रो. अज़ीज़ इंदौरी

राहत ने जीवन और जगत के विभिन्न पहलुओं पर जो ग़ज़लें कही हैं, वो हिन्दी-उर्दू की शायरी के लिए एक नया दरवाज़ा खोलती है. नए रदीफ़, नै बहार, नए मजमून, नया शिल्प उनकी ग़ज़लों में जादू की तरह बिखरा है जो पढ़ने व् सुनने वाले सभी के दिलों पर च जाता है. - गोपालदास नीरज.
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