कटी पतंग (Hindi Sahitya): Kati Patang (Hindi Novel)

Bhartiya Sahitya Inc.
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'कटी पतंग' बड़ी ही विचित्र और नाजुक परिस्थितियों में घिरी एक सुन्दर युवती की कहानी है, जिसके बारे में स्वयं लेखक का कहना है कि इसे एक बार शुरू करके आप समाप्त किये बिना नहीं रह सकते !
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About the author

 

गुलशन नन्दा
(मृत्यु 16 नवम्बर 1985)
हिन्दी के प्रसिद्ध उपन्यासकार तथा लेखक थे जिनकी कहानियों को आधार रख 1960 तथा 1970 के दशकों में कई हिन्दी फ़िल्में बनाई गईं और ज़्यादातर यह फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस में सफल भी रहीं। उन्होंने अपने द्वारा लिखी गई कुछ कहानियों की फ़िल्मों में पटकथा भी लिखी। उनके द्वारा लिखी गई कुछ हिट फ़िल्मों के नाम हैं- काजल, पत्थर के सनम, कटी पतंग, खिलौना, शर्मीली इत्यादि हैं।
इसके आलावा उनके लिखे कुछ उपन्यासों के नाम हैं - अजनबी, अन्धेरे चिराग, आसमान चुप है, कटी पतंग, कलंकिनी, काँच की चूड़ियाँ, काली घटा, गुनाह के फूल, गेलार्ड, घाट का पत्थर, चिनगारी, जलती चट्टान, झील के उस पार, टूटे पंख, डरपोक, तीन इक्के, तीन रंग, देव छाया, नीलकंठ, पत्थर के होंठ, पिंजरा, प्यासा सावन, भँवर, माधवी, मेंहदी, मैं अकेली, रूपमती, वापसी, सांवली रात, सितारों से आगे, सिसकते, सूखे पंड़ सब्ज़ पत्ते आदि।
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4.2
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Additional Information

Publisher
Bhartiya Sahitya Inc.
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Published on
Nov 26, 2014
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Pages
220
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ISBN
9781613015551
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Language
Hindi
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Genres
Fiction / Fantasy / General
Fiction / Romance / Suspense
Foreign Language Study / Hindi
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धीरे-से दबे पाँव वह सीढ़ियाँ उतर गई और बाथरूम की ओर चल दी। जैसे ही उसने बत्ती जलाने को हाथ बढ़ाया वह सिहर उठी। उसकी दृष्टि द्वार के शीशों से बाग में छिपे सीमेंट की बेंच पर पड़ी। आनंद व संध्या एक-दूसरे के आलिंगन में बंधे थे। छिटकी चाँदनी में दो यौवन मदमातों को यूँ देख बेला को रोमांच हो आया और कुछ ही क्षणों में ज्वाला भड़कने लगी। आखिर दीदी को इतनी स्वतंत्रता क्यों? तो क्या दीदी आनंद से प्रेम करती हैं? और मेरा उसके साथ जाना उनकी स्वतंत्रता में बाधा थी। सबको तो शिक्षा देती हैं किंतु स्वयं तो-' और न जाने यूं ही कितने प्रश्न उसके मस्तिष्क में मंडराने लगे। किंतु प्रत्येक प्रश्न उसके हृदय-पटल पर द्वेष की एक गहरी रेखा अंकित कर गया। जैसे ही आनंद ने संध्या के होंठों को छुआ, बेला के शरीर में फुरेरी सी दौड़ गई और उसने आँखें बंद कर लीं। उसने भी अपने होंठों पर जलते अंगारे अनुभव किए। कुछ समय पश्चात् जब उसने अपनी आँखें खोलीं तो देखा कि वह दोनों बेंच छोड़कर द्वार की ओर बड़े जा रहे थे। बेला दबे पाँव अंधेरे में छिप गई।
 शरतचन्द्र के उपन्यासों में ‘परिणीता’ एक अनूठी प्रणय कहानी है, जिसमें दहेज प्रथा की भयावहता का चित्रण किया गया है। गुरूचरण बैंक में क्लर्क थे। उन्हें जब पाँचवी कन्या होने का संवाद मिला तो एक गहरी सी ठंड़ी साँस लेने की ताकत भी उनमें नहीं रही। पिछले वर्ष दूसरी कन्या के विवाह में उन्हें पैतृक मकान तक गिरवी रखना पड़ा था। अनाथ भानजी ललिता उनके साथ रहती थी जिसकी आयु तेरह वर्ष हो गई थी, किन्तु उसके विवाह में खर्च करने के लिए गुरूचरण के पास तेरह पैसे तक नहीं थे। गुरूचरण के घर के बगल में नवीनचन्द्र राय रहते थे। उनका छोटा बेटा शेखर गुरूचरण के परिवार से बहुत आत्मीयता रखता था। ललिता आठ बरस की थी तभी से शेखर भैया के पास आती-जाती थी। शेखर से ललिता ने पढ़ना-लिखना सीखा तथा उनका हर काम वह बड़े जतन से करती थी। शेखर से पूछे बगैर ललिता का कोई काम नहीं होता था। शेखर के रूपये ललिता जब तब निःसंकोच काम में लेती रहती थी। बचपन से ललिता को शेखर का जो अपार स्नेह मिलता रहा, वही बड़े होने पर एकनिष्ठ प्रेम में बदल जाता है। शेखर को यह दुश्चिन्ता बराबर रहती थी कि ललिता से ब्याह करने के लिए माता-पिता सम्मति नहीं देंगे ओर उसका अन्यत्र विवाह हो जाएगा। एक दिन जब अनायास ललिता उसके गले में माला डाल देती है तो शेखर वापिस उसे माला पहना कर अपनी परिणीता बना लेता है, जो किसी को मालूम नहीं होता।
जीवन की, जिन्दगी की, इंसानियत की, अनेकों विविध आयामों की सतरंगी आभा को उकेरती, नदी की अजस्त्र धारा की तरह कहीं अवरुद्ध, कहीं तरंगायित तो कहीं भयावह उद्दामता की कही, अनकही बाहरी-भीतरी परतों को उकेरता यह उपन्यास सच में ही पाठक को दूर तक और देर तक अपने साथ बनाये रखने की क्षमता रखता हैं। विमल मित्र के इस उपन्यास ‘नायिका’ के जटिल कथा-सूत्र को बढ़ाने का ढंग अनूठा और पाठक को इस उपन्यास के प्रत्येक पृष्ठ की प्रत्येक पंक्ति में किसी सम्मोहन के स्वरूप जकड़े रहेगा। विमल मित्र के कृतित्व में पाठक को भावुकता का कम, संवेदनशीलता का अधिक समावेश मिलता है, और साथ ही मिलता है एक मोहक घटना प्रवाह जो कहीं भी अयथार्थ की झलक नहीं देता।
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