Matsaya Puran

Diamond Pocket Books Pvt Ltd
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पुराण साहित्य भारतीय साहित्य और जीवन की अक्षुण्ण निधि है। इनमें मानव जीवन के उत्कर्ष और अपकर्ष की अनेक गाथाएं मिलती हैं। अठारह पुराणों मे अलग- अलग देवी- देवताओं को केन्द्र में रखकर पाप और पुण्य, धर्म और अधर्म, कर्म और अकर्म की गाथाएं कही गई हैं। इस रूप मे पुराणों का पठन और आधुनिक जीवन की सीमा में मूल्यों की स्थापना आज के मनुष्य का एक निश्चित दिशा दे सकता है।

निरन्तर द्वन्द्व और निरन्तर द्वन्द्व से मुक्ति का प्रयास मनुष्य की संस्कृति का मूल आधार है। पुराण हमें आधार देते हैं। इसी उद्देश्य को लेकर पाठकों की रुचि के अनुसार सरल, सहज भाषा मे प्रस्तुत है पुराण- साहित्य की श्रृंखला में ‘मत्स्य पुराण’।

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Publisher
Diamond Pocket Books Pvt Ltd
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Pages
150
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ISBN
9789352960460
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Features
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Language
Hindi
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Genres
Religion / Devotional
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जो कथा शिवजी ने पार्वतीजी को, काकभुशुंडिजी ने गरुड़जी को, नारदजी ने वाल्मीकिजी को, याज्ञवल्क्यजी ने मुनि भरद्वाज को सुनाई, जिसकी पतित पावनी धारा तुलसीजी ने जनमानस में बहाई, उस कथा को कहना मेरे लिए दूध की नहर निकालने के समान है। समझने के लिए परमहंस का विवेक चाहिए, उसका प्रिय लगना, कथा श्रवण में रुचि पैदा होना, जन्मजन्म कृत सुकृत का फल जानना चाहिए और वह फल श्रीरामजानकीजी ने मुझे निस्संदेह प्रदान किया है।

महर्षि वाल्मीकि रामकथा के प्रथम कवि हैं। इस कारण उन्होंने प्रथम प्रणम्य का अधिकार प्राप्त कर लिया है। उनका महाकाव्य विद्वज्जन के लिए है। गोस्वामी तुलसीदासजी के रोमरोम में राम रमे हैं। सो उनका रोमरोम प्रणम्य है। उनका लेखन जनसाधारण के लिए है। मेरा प्रयत्न बुद्धिजीवी और जनसाधारण दोनों तक पहुँचने का है। मैं मानता हूँ कि मेरे पास शब्दों का प्राचुर्य नहीं, भाषा का लालित्य नहीं, छंदों की विविधता नहीं, अलंकारों की साजसज्जा नहीं, परंतु सीताराम नाम की दो ऐसी महामणियाँ हैं, जो लोकपरलोक दोनों को जगमगाने के लिए पर्याप्त हैं। राम भी एक नहीं, चारचार। राम स्वयं राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न में आंशिक रूप से राम। सीताराम भवसागर के दो ऐसे जलयान हैं, जो सावधानी से भवसागर पार कराकर वहाँ ले जाते हैं, जहाँ वे स्वयं विराजमान हैं।

सर्वथा अलग और अनोखी रामायण, जो पूर्णतया गेय है, समस्त रसों से भरपूर भक्ति और आस्था का ज्ञानसागर है यह ग्रंथरत्न।

भारतीय चिंतनधारा के विकास में ॠग्‍वेदकाल के बाद षड्दर्शनों का अत्‍यंत महत्‍व है। जब हम परंपरा की बात करते हैं तो वेद, ब्रह्मसूत्र उपनिषद् और गीता जैसे ग्रंथोंसे ही हमारा तात्‍पर्य होता है। क्‍योंकि परंपरा का अर्थ है ‘जो हमारे पवित्र-आर्यग्रंथों में लिखा है। अत पूरी भारतीय परंरा को जानने के लिए दर्शनों का अध्‍ययन आवश्‍यक हो जाता है। इसीलिए हमने संक्षेप में और सरल भाषा में विभिन्‍न दर्शनों की व्‍याख्‍या प्रस्‍तुत की है। भारतीय मनीषियों के अनुसार दर्शन मनुष्‍यकी मूल उत्‍पत्ति और उसकी समस्‍याओंकी, प्रकृति एवं ब्रह्माण्‍ड की व्‍याख्‍या करते हुए उसके काव्‍य को व्‍यक्‍त करता है। इस तरह विचार करने पर दर्शन और दर्शन का इतिहास बनता है। भारत में इतिहास बनने की प्रक्रिया में ही षड्दर्शनों का आविर्भाव हुआ अर्थात वेदों के बाद के चिंतनमें सांख्‍य, वैशेषिक, योग, मीमांसा, न्‍याय और वेदांत दर्शनों का स्‍वररूप सामने आया। हमारे प्राचीन ॠ‍षियों और चिंतकों ने ईश्‍वर और जगत् का संबंध जानने में उनकी व्‍याख्‍या में दर्शन का विकास किया।
हिंदू देवी-देवताओं के नयनाभिराम और सुंदर चित्र भक्‍तों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं तथा उनमें आस्था एवं भक्‍त‌िभाव की अजस्र धारा प्रवाहित कर देते हैं। पर कम ही लोग इन चित्रों में प्रदर्शित विभिन्न स्वरूपों के बारे में ज्ञान रखते हैं।

प्रस्तुत पुस्तक हिंदू कलेंडर कला के इन चित्रों के रहस्यों को सुलझाने का एक सुंदर प्रयास है। इसमें बताया गया है—

गणेश सभी बाधाओं को दूर करनेवाले देवता हैं।

शेर पर सवार चामुंडा प्रकृति पर अपने प्रभुत्व का संकेत करती है।

अपनी हथेली को उठाकर देवी अपने भक्‍तों से कहती हैं कि डरने की जरूरत नहीं है।

गणेश का एक टूटा हुआ दाँत संयम का प्रतीक है।

भू-देवी, यानी गाय के रूप में पृथ्वी लक्ष्मी का दूसरा रूप है।

हिंदुओं की आस्था के केंद्रबिंदु देवी-देवताओं के चित्रों के माध्यम से धार्मिक नवजागरण का मार्ग प्रशस्त करती एक पठनीय पुस्तक।

भारतीय जीवन-धारा में जिन ग्रंथों का महत्वपूर्ण स्थान है उनमें पुराण भक्ति ग्रंथों के रूप में बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं । पुराण-साहित्य भारतीय जीवन और साहित्य की अक्षुण्ण निधि हैं । इनमें मानव जीवन के उत्कर्ष और अपकर्ष की अनेक गाथाएं मिलती हैं । कर्मकांड से ज्ञान की ओर आते हुए भारतीय मानस चिंतन के बाद भक्ति की अविरल धारा प्रवाहित हुई । विकास की इसी प्रक्रिया में बहुदेववाद और निर्गुण ब्रह्म की स्वरूपात्मक व्याख्या से धीरे-धीरे भारतीय मानस अवतारवाद या सगुण भक्ति की ओर प्रेरित हुआ । अठारह पुराणों में अलग- अलग देवी देवताओं को केन्द्र मान कर पाप और पुण्य, धर्म और अधर्म, कर्म और अकर्म की गाथाएं कही गई हैं ।

आज के निरन्तर द्वन्द्व के युग में पुराणों का पठन मनुष्य को उस द्वन्द्व से मुक्ति दिलाने में एक निश्चित दिशा दे सकता है और मानवता के मूल्यों की स्थापना में एक सफल प्रयास सिद्ध हो सकता है । इसी उद्देश्य को सामने रख कर पाठकों की रुचि के अनुसार सरल, सहज भाषा में पुराण साहित्य की श्रृंखला में यह पुस्तक प्रस्तुत है ।

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