कामायनी (Hindi Epic): Kamayani (Hindi Epic)

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आज के मनुष्य के समीप तो उसकी वर्तमान संस्कृति का क्रमपूर्ण इतिहास ही होता है; परन्तु उसके इतिहास की सीमा जहाँ से प्रारंभ होती है ठीक उसी के पहले सामूहिक चेतना की दृढ़ और गहरे रंगों की रेखाओं से बीती हुई और भी पहले की बातों का उल्लेख स्मृति-पट पर अमिट रहता हैं, परन्तु कुछ अतिरंजित-सी वे घटनाएँ आज विचित्रता से पूर्ण जान पड़ती हैं। संभवतः इसीलिए हमको अपनी प्राचीन श्रुतियों का निरुक्त के द्वारा अर्थ करना पड़ा; जिससे कि उन अर्थों का अपनी वर्तमान रुचि से सामंजस्य किया जाय। यदि श्रद्धा और मनु अर्थात् मनन के सहयोग से मानवता का विकास रूपक है, तो भी बड़ा ही भावमय और श्लाध्य है। यह मनुष्यता का मनोवैज्ञानिक इतिहास बनने में समर्थ हो सकता है। आज हम सत्य का अर्थ घटना कर लेते हैं। तब भी उसके तिथिक्रम मात्र से संतुष्ट न होकर, मनोवैज्ञानिक अन्वेषण के द्वारा इतिहास की घटना के भीतर कुछ देखना चाहते हैं। उसके मूल में क्या रहस्य है? आत्मा की अनुभूति! हाँ, उसी भाव के रूप-ग्रहण की चेष्टा सत्य या घटना बनकर प्रत्यक्ष होती है। फिर वे सत्य घटनाएँ स्थूल और क्षणिक होकर मिथ्या और अभाव में परिणत हो जाती हैं। किन्तु सूक्ष्म अनुभूति या भाव, चिरंतर सत्य के रूप में प्रतिष्ठित रहता है, जिसके द्वारा युग-युग के पुरुषों की और पुरुषार्थों की अभिव्यक्ति होती रहती है।
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About the author

जयशंकर प्रसाद

(३० जनवरी १८८९ - १४ जनवरी १९३७)

हिन्दी कवि, नाटकार, कथाकार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे। वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्होंने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई और वह काव्य की सिद्ध भाषा बन गई।

उन्हें 'कामायनी' पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्राप्त हुआ था। उन्होंने जीवन में कभी साहित्य को अर्जन का माध्यम नहीं बनाया, अपितु वे साधना समझकर ही साहित्य की रचना करते रहे। कुल मिलाकर ऐसी विविध प्रतिभा का साहित्यकार हिंदी में कम ही मिलेगा जिसने साहित्य के सभी अंगों को अपनी कृतियों से समृद्ध किया हो।

प्रमुख रचनाएं

कालक्रम से प्रकाशित उनकी कृतियाँ ये हैं :

उर्वशी (चंपू) ; सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य (निबंध); शोकोच्छवास (कविता); प्रेमराज्य (क) ; सज्जन (एकांक), कल्याणी परिणय (एकाकीं); छाया (कहानीसंग्रह); कानन कुसुम (काव्य); कल्णालय (गीतिकाव्य); प्रेमपथिक (काव्य); प्रायश्चित (एकांकी); महाराणा का महत्व (काव्य); राजश्री (नाटक) चित्राधार (इसमे उनकी 20 वर्ष तक की ही रचनाएँ हैं)। झरना (काव्य); विशाख (नाटक); अजातशत्रु (नाटक) कामना (नाटक), आँसू (काव्य), जनमेजय का नागयज्ञ (नाटक); प्रतिध्वनि (कहानी संग्रह); स्कंदगुप्त (नाटक); एक घूँट (एकांकी); अकाशदीप (कहानी संग्रह); ध्रुवस्वामिनी (नाटक); कंकाल, तितली (उपन्यास); लहर (काव्य संग्रह); इंद्रजाल (कहानीसंग्रह); कामायनी (महाकाव्य); इरावती (अधूरा उपन्यास)। प्रसाद संगीत (नाटकों में आए हुए गीत)।इसके अलावा कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में भी उन्होंने कई यादगार कृतियाँ दीं।

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Additional Information

Publisher
Bhartiya Sahitya Inc.
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Published on
May 23, 2014
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Pages
105
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ISBN
9781613014295
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Language
Hindi
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Genres
Foreign Language Study / Hindi
Poetry / Epic
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हिन्दी कथा-साहित्य के विकास के प्रथम चरण में ही प्रसाद जी ने कविताओं के साथ कथा-साहित्य के क्षेत्र में पदार्पण किया। उनकी सांस्कृतिक अभिरूचि और वैयक्तिक भावानुभूति की स्पष्ट छाप के कारण उनके द्वारा रचित कथा-साहित्य अपनी एक अलग पहचान बनाने में पूर्णतः सक्षम हुआ। जयशंकर प्रसाद अपने समय के प्रयोगधर्मी रचनाकार थे। भारतेन्दु युगीन खुमारी से मुक्त होकर उन्होंने नाटक और कविता के क्षेत्र में ही नहीं कथा साहित्य के क्षेत्र में भी प्रयोग किया। 1926 से 1929 ई. के बीच प्रसाद के दृष्टिकोण में यथार्थ के प्रति परिवर्तन दिखाई पड़ता है। यह परिवर्तन उनकी मूल स्थापनाओं में कम संसार की पहचान के स्तर पर ही अधिक हुआ है। साहित्य, समाज और मानव संस्कृति आदि उनके लिए अलग-अलग प्रत्यय नहीं बल्कि प्रत्यय श्रंखलाएँ हैं। उनकी प्रमुख समस्या है कि मनुष्य के बिना किसी विकृति और अवरोध के कैसे पूर्णता प्राप्त कर सकता है। कैसे वह अपनी मुक्ति के साथ-साथ दूसरों को मुक्त रख सकता है। वे प्रारम्भ से ही आनन्द को एक मूल्य मानकर चलते हैं और बुद्धि या विवेक को अपूर्णता का कारण मानते हैं। कुल मिलाकर प्रसाद जी का कथा साहित्य उनकी सांस्कृतिक दृष्टि और अनुभूति पर रचना बोध के कारण हिन्दी कथा साहित्य में चिरस्मरणीय बना रहेगा
जीवन की, जिन्दगी की, इंसानियत की, अनेकों विविध आयामों की सतरंगी आभा को उकेरती, नदी की अजस्त्र धारा की तरह कहीं अवरुद्ध, कहीं तरंगायित तो कहीं भयावह उद्दामता की कही, अनकही बाहरी-भीतरी परतों को उकेरता यह उपन्यास सच में ही पाठक को दूर तक और देर तक अपने साथ बनाये रखने की क्षमता रखता हैं। विमल मित्र के इस उपन्यास ‘नायिका’ के जटिल कथा-सूत्र को बढ़ाने का ढंग अनूठा और पाठक को इस उपन्यास के प्रत्येक पृष्ठ की प्रत्येक पंक्ति में किसी सम्मोहन के स्वरूप जकड़े रहेगा। विमल मित्र के कृतित्व में पाठक को भावुकता का कम, संवेदनशीलता का अधिक समावेश मिलता है, और साथ ही मिलता है एक मोहक घटना प्रवाह जो कहीं भी अयथार्थ की झलक नहीं देता।
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