राख और अंगारे (Hindi Sahitya): Raakh Aur Angaare (Hindi Novel)

Bhartiya Sahitya Inc.
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‘मेरी भी एक बेटी थी। उसे जवानी में एक आवारा व्यक्ति से प्रेम हो गया। मेरे लाख समझाने पर भी वह बाज न आई और एक दिन वह उसके साथ भाग गई परन्तु उस आवारा ने उससे विवाह नहीं किया और उसे नर्तकी बनाकर बीच मझदार में छोड़ दिया और स्वयं उसकी कमाई पर ऐश करता रहा-' -इसी उपन्यास से
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About the author

गुलशन नन्दा 
(मृत्यु 16 नवम्बर 1985) 

हिन्दी के प्रसिद्ध उपन्यासकार तथा लेखक थे जिनकी कहानियों को आधार रख 1960 तथा 1970 के दशकों में कई हिन्दी फ़िल्में बनाई गईं और ज़्यादातर यह फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस में सफल भी रहीं। उन्होंने अपने द्वारा लिखी गई कुछ कहानियों की फ़िल्मों में पटकथा भी लिखी। उनके द्वारा लिखी गई कुछ हिट फ़िल्मों के नाम हैं- काजल, पत्थर के सनम, कटी पतंग, खिलौना, शर्मीली इत्यादि हैं। 


इसके आलावा उनके लिखे कुछ उपन्यासों के नाम हैं - अजनबी, अन्धेरे चिराग, आसमान चुप है, कटी पतंग, कलंकिनी, काँच की चूड़ियाँ, काली घटा, गुनाह के फूल, गेलार्ड, घाट का पत्थर, चिनगारी, जलती चट्टान, झील के उस पार, टूटे पंख, डरपोक, तीन इक्के, तीन रंग, देव छाया, नीलकंठ, पत्थर के होंठ, पिंजरा, प्यासा सावन, भँवर, माधवी, मेंहदी, मैं अकेली, रूपमती, वापसी, सांवली रात, सितारों से आगे, सिसकते, सूखे पंड़ सब्ज़ पत्ते आदि।

 

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Additional Information

Publisher
Bhartiya Sahitya Inc.
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Published on
Jan 30, 2014
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Pages
172
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ISBN
9781613013021
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Language
Hindi
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Genres
Fiction / Family Life
Fiction / Romance / General
Foreign Language Study / Hindi
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 पता नही कितनी देर तक वह यों ही मन ही मन बड़बड़ाता रहा, पर चित्रा के भूत से मुक्ति न मिली। एक दोस्त की मेज़ के पास खड़े होकर चाय की प्याली मुँह से लगाये-लगाये उसने एक उड़ती हुई नज़र चारों तरफ़ डाली–चित्रा का कहीं पता न था। आख़िर हारकर वह एक मेज़ पर बैठ गया, और उसी दम गोपाल बैनर्जी ने बंगाल के माँझियों के गीत शुरू किये। एक के बाद एक उसने चार भटियाली गीत सुनाये और हवा में गोया पानी लहरें मारने लगा, पाल उड़ने लगे, पानी काटते हुए चप्पू छपछप करने लगे, सूरज क्षितिज पर डूबने लगा, सुधियों का चंदन बिखरने लगा, चाँद नील महासागर में अकेले अपनी नाव खेने लगा, प्यारी के भौंरे जैसे काले केशों से बकुल की गंध आने लगी, आँगन का केले का गाछ हरा हो गया, मन पिघलने लगा, निर्जन कगार अरर अरर ढहने लगे...
 राजन, सीतलवादी में एक कंपनी में काम की तलाश में जाता है। वहां एक दिन रास्ते में वह एक लड़की से टकरा जाता है। जिसका नाम पार्वती है। वह दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं और शादी करना चाहते हैं। लेकिन जब यह बात लड़की के बाबा को पता चलती है। तो वह यह आघात बर्दाश्त नहीं कर पाते और मरने से पहले पार्वती का विवाह कंपनी के मैनेजर हरीश से तय कर जाते हैं। एक दिन रस्सी का पुल पार करते हुए हरीश का पैर फिशलता है और वह मर जाता है। पार्वती, राजन को हरीश का जिम्मेदार ठहराती है क्योंकि घटना के समय राजन भी वही मौजदू होता है। क्या वास्तव में ही राजन हरीश की मौत का जिम्मेदार था ? क्या पार्वती के विधवा होने पर राजन ने फिर उससे विवाह किया ? क्या पार्वती ने अपने पति की मौत का बदला लिया ? दो तड़पते दिलों की कहानी जिसे लोकप्रिय उपन्यासकार गुलशन नंदा ने लिखा है।
 शरतचन्द्र के उपन्यासों में ‘परिणीता’ एक अनूठी प्रणय कहानी है, जिसमें दहेज प्रथा की भयावहता का चित्रण किया गया है। गुरूचरण बैंक में क्लर्क थे। उन्हें जब पाँचवी कन्या होने का संवाद मिला तो एक गहरी सी ठंड़ी साँस लेने की ताकत भी उनमें नहीं रही। पिछले वर्ष दूसरी कन्या के विवाह में उन्हें पैतृक मकान तक गिरवी रखना पड़ा था। अनाथ भानजी ललिता उनके साथ रहती थी जिसकी आयु तेरह वर्ष हो गई थी, किन्तु उसके विवाह में खर्च करने के लिए गुरूचरण के पास तेरह पैसे तक नहीं थे। गुरूचरण के घर के बगल में नवीनचन्द्र राय रहते थे। उनका छोटा बेटा शेखर गुरूचरण के परिवार से बहुत आत्मीयता रखता था। ललिता आठ बरस की थी तभी से शेखर भैया के पास आती-जाती थी। शेखर से ललिता ने पढ़ना-लिखना सीखा तथा उनका हर काम वह बड़े जतन से करती थी। शेखर से पूछे बगैर ललिता का कोई काम नहीं होता था। शेखर के रूपये ललिता जब तब निःसंकोच काम में लेती रहती थी। बचपन से ललिता को शेखर का जो अपार स्नेह मिलता रहा, वही बड़े होने पर एकनिष्ठ प्रेम में बदल जाता है। शेखर को यह दुश्चिन्ता बराबर रहती थी कि ललिता से ब्याह करने के लिए माता-पिता सम्मति नहीं देंगे ओर उसका अन्यत्र विवाह हो जाएगा। एक दिन जब अनायास ललिता उसके गले में माला डाल देती है तो शेखर वापिस उसे माला पहना कर अपनी परिणीता बना लेता है, जो किसी को मालूम नहीं होता।
रेनु डाकिए के हाथ से तार का लिफाफा लेकर ब़ाग प्लेटफार्म की ओर दौड़ी, जहाँ रायसाहब, मालकिन और संध्या बैठे शाम की चाय पी रहे थे। रेनु के हाथ में लिफाफा देखकर संध्या ने पूछा, ‘कौन आया है?’

‘पोस्टमैन-पापा का तार आया है।’ लिफाफा पापा के हाथ में थमाते हुए रेनु एक ही सांस में सब कह गई।

सबकी दृष्टि रायसाहब के मुख पर जम गई, जो तार देखकर पीला पड़ गया था। तार पकड़ते ही उनके मुख पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गई और साथ ही सबकी रुकी सांसें चलने लगी। मालकिन ने झट पूछा-

‘किसका है?’

‘बेला का-कल शाम की गाड़ी से आ रही है।’ तार संध्या के हाथ में देते हुए रायसाहब ने प्लेट से एक लड्डू उठाकर मुँह में डाल लिया। रेनु तो सुनकर नाचने ही लगी-‘कल मेरी दीदी आएगी’ और यह खबर सुनाने पड़ोस में चली गई।

 राजन, सीतलवादी में एक कंपनी में काम की तलाश में जाता है। वहां एक दिन रास्ते में वह एक लड़की से टकरा जाता है। जिसका नाम पार्वती है। वह दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं और शादी करना चाहते हैं। लेकिन जब यह बात लड़की के बाबा को पता चलती है। तो वह यह आघात बर्दाश्त नहीं कर पाते और मरने से पहले पार्वती का विवाह कंपनी के मैनेजर हरीश से तय कर जाते हैं। एक दिन रस्सी का पुल पार करते हुए हरीश का पैर फिशलता है और वह मर जाता है। पार्वती, राजन को हरीश का जिम्मेदार ठहराती है क्योंकि घटना के समय राजन भी वही मौजदू होता है। क्या वास्तव में ही राजन हरीश की मौत का जिम्मेदार था ? क्या पार्वती के विधवा होने पर राजन ने फिर उससे विवाह किया ? क्या पार्वती ने अपने पति की मौत का बदला लिया ? दो तड़पते दिलों की कहानी जिसे लोकप्रिय उपन्यासकार गुलशन नंदा ने लिखा है।
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