1.25 billion corruption सवा अरब भ्रष्टाचार: New Satires-1/नये व्यंग्य-1

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*न तो क़िताब मूर्ति है न लेखक भगवान*

बचपन से लेकर काफ़ी बाद तक कितने ही पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ा कि हमारा समाज बहुत भावुक है और पश्चिम बहुत भौतिकतावादी है। मगर व्यवहार में देखा कि हमारे यहां नये, पवित्र कहे जानेवाले, और जनम-जनम के कहे जानेवाले रिश्तों की नींव भी पैसे के आधार पर रखी जाती है, बाक़ी कोई भी रीति-रिवाज-त्यौहार लिफ़ाफ़ो के लेन-देन के बिना ज़रा-सा भी आगे नहीं सरकता।

और आगे चलकर जैसे-जैसे अपना सोचने, ख़ुदको ही डरानेवाले ख़्यालों पर ख़ुलकर विश्लेषण करने का होश और हिम्मत आते गए तो लगने लगा कि हमारी क़िताबों में लोगों ने अपनी आज़माई बातों के साथ सुनी-सुनाई और पढ़ी-पढ़ाई बातें भी अच्छी-ख़ासी मात्रा में लिख रखीं हैं। ऐसे और भी कुछ कारण रहे कि क़िताबों में पहले जैसी रुचि नहीं रह गई।

क़िताबों के प्रति भगवान-भक्त जैसी आस्था और श्रद्धा पैदा करने की कोशिशें अब ज़रा नहीं सुहातीं। क़िताब को लगभग मूर्ति, लेखक को लगभग भगवान बनाने और बिक्री को चढ़ौती की तरह हासिल करने की मानसिकता अजीब लगती है। क़िताबें ज़रुरी हैं, उपयोगी हैं, मगर लेखक कोई पवित्रता (?) की लाँड्री में से निकला मसीहा नहीं है कि उसके लिखे को पढ़ने के बजाय चरनामृत की तरह खोपड़े पर उड़ेलकर यह सोचा जाए कि इसमें से जो निकलेगा सब अंदर घुसकर अपने-आप कोई रास्ता बनाएगा और हमारे दिल-दिमाग़ को सिर्फ़ सच्चाई की ओर ही ले जाएगा। जैसा मैंने समाज को देखा है, मुझे तो बिलकुल भी नहीं लगता कि लेखक सिर्फ़ सच ही लिखता है। लेकिन हम अगर हिंदू-मुस्लिम या वाम-दक्षिण जैसे खानों में बंटे हो तो हमारे झूठ और सच को समझने के पैमाने पूर्वाग्रही हो ही जाते हैं।

अगर समाज की जड़ों तक पाखंड पसरा हो तो पाठक भी झूठ को सच की तरह ही पढ़ता है। जो लेखक शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाई जानेवाली क़िताबों में शामिल होने के लिए सर के बल हो जाते हैं उनके द्वारा लिखे गए स्वाभिमान के निबंध में कितना दम और कितनी सच्चाई हो सकती है !?

तुलसीदास और मनुमहाराज के महाग्रंथ किसीके लिए छाती से लगाए रखने के क़ाबिल हैं तो दूसरे कई लोगों के लिए क़ाबिले-बर्दाश्त भी नहीं हैं।

क़िताबों के प्रति जागरुकता पैदा करनी चाहिए, श्रद्धा, आस्था और अंधभक्ति नहीं।

-संजय ग्रोवर

03-09-2014

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About the author

ʘ SANJAY GROVER संजय ग्रोवर :

ʘ सक्रिय ब्लॉगर व स्वतंत्र लेखक.

ʘ Active Blogger and Freelance Writer.

ʘ मौलिक और तार्किक चिंतन में रुचि.

ʘ Inclined toward original and logical thinking.

ʘ नये विषयों, नये विचारों और नये तर्कों के साथ लेखन.

ʘ loves writing on new subjects with new ideas and new arguments.

ʘ फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी सक्रिय.

ʘ Also active on Facebook and Twitter.

ʘ पत्र-पत्रिकाओं में कई व्यंग्य, कविताएं, ग़ज़लें, नारीमुक्ति पर लेख आदि प्रकाशित.

ʘ Several satires, poems, ghazals and articles on women's lib published in various journals.

ʘ बाक़ी इन लेखों/व्यंग्यों/ग़जलों/कविताओं/कृतियों के ज़रिए जानें :-)

ʘ Rest.. learn by these articles/satires/ghazals/poems/creations/designs :-)

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4.4
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Additional Information

Publisher
Sanjay Grover
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Published on
May 20, 2015
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Pages
61
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Language
Hindi
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Genres
Literary Criticism / Humor
Young Adult Fiction / Humorous / Satire
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नास्तिकता का अपना यह सफ़र बहुत दिलचस्प रहा।

सामुदायिक ब्लॉग ‘नास्तिकों का ब्लॉग’ पर पहली पोस्ट लिखी-‘नास्तिकता सहज है’।

http://nastikonblog.blogspot.in/2010/04/blog-post_24.html

अच्छी बहस चली। दो-एक पोस्ट और लिखीं। आखि़री पोस्ट पर ज़बरदस्त बहस छिड़ गई, इतनी कि प्रतिपक्ष के लोग मेरे पीछे-पीछे फ़ेसबुक पर चले आए और बताने लगे कि नास्तिक होने या बने रहने के क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं। उसी दिन मैंने फ़ेसबुक पर ‘नास्तिकThe Atheist’  नाम से ग्रुप बना दिया। इसमें बारह-तेरह लोग थे जिनमें से संभवतः कुछ वामपंथी और कुछ बसपाई मित्र थे। एक नया काम यह किया कि दूसरों की तरह हमने अपनी तरफ़ से किसीको ‘ऐड’ नहीं किया बल्कि जो लोग ख़ुद रिक्वेस्ट करते थे उन्हीं मे से कुछ को/सबको ले लेते थे।

एक काम यह किया कि हमने अपनी पोस्टों/विचारों या तर्कों को आस्तिकता के उन्हीं तर्कों तक सीमित रखा जो हमारे आस्तिक मित्र रोज़मर्रा के जीवन में इस्तेमाल करते हैं। अणु-परमाणु की बहसों की हमने तथाकथित ईश्वर के संदर्भ में क़तई परवाह नहीं की। छोटी से छोटी बात पर तर्क रखे, बहस की। नये से नये तर्क जो पहले कभी रखे नहीं गए थे। साल-भर के अंदर ग्रुप के बाहर भी नास्तिकता पर काफ़ी स्टेटस दिखाई देने लगे। सबसे मज़ेदार बात यह हुई कि जो लोग नास्तिकता का नाम भी लेने में हिचकिचाते थे, वे ख़ुदको असली नास्तिक और हमें नक़ली नास्तिक बताने लगे। मिलते-जुलते नामों से ग्रुप खुलने लगे। ख़ुद मैंने भी एक ब्लॉग ‘नास्तिकThe Atheist’ नाम से बना डाला।

http://nastiktheatheist.blogspot.in/

ग्रुप भी फ़ेसबुक पर चल ही रहा है और मैं ज़्यादा लफ़्फ़ाज़ी करके आपको बोर नहीं करना चाहता ; इस व्यंग्य-संग्रह को पढ़कर बाक़ी अंदाज़ा आप ख़ुद ही लगा लेंगे।

अगर आप नास्तिक नहीं हैं तो इस संग्रह को इसलिए पढ़ सकते हैं कि पढ़कर हमारी धज्जियां उड़ा सकें, हमें शर्मिंदा कर सकें, हमें सोचने पर मजबूर कर सकें।

( नास्तिकता पर अगली क़िताब जल्दी ही.... )

-संजय ग्रोवर

10-07-2015

यहां, मित्रों/पाठकों की प्रतिक्रियाओं के जवाब देने के लिए उचित जगह फ़िलहाल दिखाई नहीं दे रही, इसलिये यहीं जवाब दिए दे रहा हूं-

शोभाराम वर्मा जी, ये सब बक़वास क्यों है, कारणों के साथ बताते तो मैं ज़रुर जवाब देने की कोशिश करता।

सोनम चौधरी जी, अगर भगवान निराश व्यक्तियों के काम आता है तो वह उन्हें निराश बनाता ही क्यों है ? भगवान क्या कोई छंटा हुआ राजनेता है कि पहले लोगों को निराश करता है, उनके काम बिगाड़ता है फिर ख़ुद ही उनका काम सुधारने के नाम पर अपनी इमेज बनाने चला आता है ? अंततः ग़रीब और निराश लोगों को मिलता क्या है भगवान से ? अगर भगवान निराशों और ग़रीबों के इतना क़रीब है तो भगवान को पाने के लिए सभी अमीर और आशावादी भक्त ग़रीब और निराश क्यों नहीं हो जाते ? आप कब ग़रीब हो रहीं हैं ?

साहिल चौहान जी, किसी काल्पनिक चीज़ पर विश्वास करना और किसी वास्तविक चीज़ पर विश्वास करना दो अलग-अलग बातें हैं।

Dear Sahil, I am not that kind of atheist. You must understand the difference between believing a hypothetical thing and believing in a genuine thing.

-संजय ग्रोवर

06-08-2017


"पूछिए….. आप कैसे समय में से १ घंटे की अवधी जीत सकते हैं?” 

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मारए ओ’कोनारे की घडी ३ बजकर ५७ मिनट पर बंद पड चुकी हैं। परंतु उसके सामने इससे भी बहुत बडी मुसीबतें खडी हैं। जब वह अपनी घडी ठीक कराने के लिए घडीसाज के पास जाती है तो अपने आपको एक अजीबोगरीब पुरस्कार की हकदार पाती हैं। उसे अपनी जिंदगी का एक घंटा दोबारा जीने का मौका मिल जाता है। अपने अतीत के साथ कोई कितनी खिलवाड कर पाएगा इस पर सख्त और कडे नियम लागू हैं। मारए को यह चेतावनी भी मिलती है कि वह ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती जिससे समय के प्रति विरोधाभास निर्माण हो। क्या मारए अपनी उस गलती को सुधार पाएगी जिसे वह जिंदगी में सबसे ज्यादा कोसती है? "एक मार्मिक कहानी, अपनी सबसे बडी गलती सुधारने का लाखों में एक मौका!"- पाठक का विष्लेषण "एक गतिमान और नाटकीय कहानी। यदि हमें अपने अतीत को बदलने का मौका मिला तो क्या हम उसे आजमाएंगे?" -पाठक का विष्लेषण "एक मार्मिक लघु कहानी जो नॉर्स (स्कैंडेनेविया प्रांत) पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं। समय एक उपहार है, और कई बार एक आखरी मौका," - डेल एमीदइ, लेखक कैसा होगा यदि आप इसे दुबारा जी सके? 

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English translation: Marae O’Conaire has much bigger problems than the fact her watch stopped at 3:57 p.m. When she brings her watch to a kindly repairman, she learns she has won a peculiar prize, a chance to re-live a single hour of her life. But Fate has strict rules about how one can go poking in the past, including the warning that she can’t do anything that would create a time-paradox. Can Marae make peace with the mistake she regrets most in this world? A story about racism, regret, and second chances set in the historic mill city of Lowell, Massachusetts.

*

Keywords: Hindi language books, Hindi books, Hindi language edition, Hindi edition, Norse mythology, Norns, time travel, Fate, interracial dating, prejudice, racism, second chances, Hindi language, Hindi edition, Hindi language edition, Hindi books, Hindi language books, Hindi language novels, Hindi books, Hindi novels, Hindi romance, Hindi language romance, reincarnation, Norse mythology, Hindi language fantasy, हिन्दी भाषा की किताबें, हिंदी किताबें, हिंदी भाषा संस्करण, हिंदी संस्करण, नॉर्स पौराणिक कथाओं, Norns, समय यात्रा, भाग्य, अंतरजातीय डेटिंग, पूर्वाग्रह, नस्लवाद, दूसरी संभावना, हिंदी भाषा, हिंदी संस्करण, हिंदी भाषा संस्करण, हिंदी किताबें, हिंदी भाषा की किताबें, हिंदी भाषा उपन्यास, हिंदी किताबें, हिंदी उपन्यास, हिंदी रोमांस, हिंदी भाषा रोमांस, पुनर्जन्म, नॉर्स पौराणिक कथाओं, हिंदी भाषा कल्पना,

"कहते हैं जिसने प्रेमचंद नहीं पढ़ा उसने हिन्दुस्तान नहीं पढ़ा।"

प्रेमचंद ने 14 उपन्यास व 300 से अधिक कहानियाँ लिखीं। उन्होंने अपनी सम्पूर्ण कहानियों को 'मानसरोवर' में संजोकर प्रस्तुत किया है। इनमें से अनेक कहानियाँ देश-भर के पाठ्यक्रमों में समाविष्ट हुई हैं, कई पर नाटक व फ़िल्में बनी हैं जब कि कई का भारतीय व विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है।

अपने समय और समाज का ऐतिहासिक संदर्भ तो जैसे प्रेमचंद की कहानियों को समस्त भारतीय साहित्य में अमर बना देता है। उनकी कहानियों में अनेक मनोवैज्ञानिक बारीक़ियाँ भी देखने को मिलती हैं। विषय को विस्तार देना व पात्रों के बीच में संवाद उनकी पकड़ को दर्शाते हैं। ये कहानियाँ न केवल पाठकों का मनोरंजन करती हैं बल्कि उत्कृष्ट साहित्य समझने की दृष्टि भी प्रदान करती हैं।

ईदगाह, नमक का दारोगा, पूस की रात, कफ़न, शतरंज के खिलाड़ी, पंच-परमेश्वर, आदि अनेक ऐसी कहानियाँ हैं जिन्हें पाठक कभी नहीं भूल पाएँगे।

(अगर किताब पसंद आई हो तो Please Review डालना न भूलें।)

Mansarover 1 by Premchand

Publisher: General Press

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